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सोमवार, 15 अप्रैल 2019

हालात

आवारगी के हमपे ज़माने आए,
जबसे हम इस शहर में कमाने आए !

इतनी सी देर को हम घर आते हैं,
जैसे कि कोई क़र्ज़ चुकाने आए !

वक़्त बदला तो फ़िर ऐसा बदला,
तीर पे ख़ुद चल के निशाने आए !

कुछ लोग तेरा ज़िक्र छेड़ देते हैं,
जब आए तो बस आग लगाने आए !

बिछड़ के वो ख़ुश भी हैज़िन्दा भी है,
वादे भी कहाँ उसको निभाने आए !

जागे तो देखा कि तकिया नम था,
कल रात तेरे ख़्वाब सिरहाने आए !

सुर्ख़ जोड़े
 में वो आए मेरी मय्यत पे,
कुछ इस तरह वो हमको जलाने आए !

'अल्फ़ाज़हमने ख़ुद को ख़ुद ही मना लिया,
बहुत देर में वो हमको मनाने आए !

||| अल्फ़ाज़ |||

आवारगी = Wandering, Loitering, Waywardness
ज़माने = Times, Age, Era, काल, समय
क़र्ज़ = Debt, Loan, ऋण, उधार
ख़ुद = Self, Oneself, स्वयं
तीर = Arrow, बाण
ज़िक्र = Narration, Talk, बात, चर्चा
सुर्ख़-जोड़ा = Red Wedding Dress
मय्यत = Dead Body, Corpse, अर्थी, अंतिम-संस्कार

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

अशआर की हाज़िरी !!!

मेरी हस्ती को दरकार नहीं शीशों की,
रेज़ा-रेज़ा होकर मुझे शीशागरी आई है !

है ग़रज़ तो ले ले  तू मेरी ठोकरों से सबक़,
जा-ब-जा भटका हूँ तो मुझे रहबरी आई है !

बस यही पल हैं हक़ीकत, तू जी भर जी ले,
क्या ख़बर कौन सी सांस आखरी आई है !

फ़ुरसतें, आवारगी, और सब शौक़-ओ-जूनून,
आदतों के सौदे में हाथ ये नौकरी आई है !

चल के काँटों पे है मैंने हँसना सीखा,
हो के मिसमार तजुर्बों से मसख़री आई है !

तू क्यूँ हैरान होता है मेरी बेनियाज़ी पर,
तेरी बेरुख़ी से ही हमें ये ख़ुदसरी आई है !

तेरी सोहबत हुई तो इश्क़ को जाना हमने,
तेरी फ़ुरक़तों में हासिल ये शायरी आई है !

तू भी फ़राज़ के अल्फाज़ से हानत ले ले,
आज फ़िर मुझपर अशआर की हाज़िरी आई है !

|||
फ़राज़|||

दरकार= Need, Necessity.
रेज़ा-रेज़ा= Shattered.
शीशागरी= Glass making.
ग़रज़= Intention, Purpose, Object. 
जा-ब-जा= Everywhere
रहबरी= Guidance.
फ़ुरसत= Leisure.
आवारगी= Wandering, Waywardness.
शौक़= Ardour, Desires.
जूनून= Frenzy, Madness.
मिसमार- Demolished, Razed, Ruined.
मसख़री= Comedy, Funnyness.
बेनियाज़ी= Unconcern, Not being in any need.
बेरुख़ी= Ignorance, Indifference.
ख़ुदसरी= Obstinate, Stubbornness.
सोहबत= Association, Company.
फ़ुरक़त= Absences, Separation.
अल्फाज़= Words.
ज़हानत= Intelligence.
अशआर= Couplets.
हाज़िरी= Presence, Attendance.



सोमवार, 31 जुलाई 2017

बरबादियाँ !!!

हक़ीकत-ए-हस्ती अपनी
मैं तुझसे बयां करता हूँ,
हार जाता हूँ जब ख़ुद से
तो गुनाह करता हूँ मैं !

तू भी पाक दामन नहीं
ऐब तुझमे भी हैं बेशक़,
बारहा तेरी पर्देदारियों का 
एहतराम करता हूँ मैं !

मेरी लकीरों में थी आवारगी
तो तुझे इल्ज़ाम क्या दूँ,
खेल  लकीरों का ही था,
चल एतराफ़ करता हूँ मैं !

पूज कर उस पत्थर को
मैंने ही ख़ुदा कर डाला,
बरबादियों का कुछ यूँ
इन्तिज़ाम करता हूँ मैं !

शायद तू फ़िर से कभी
सब छोड़ के आ जाये,
शिक़ायतें, हसरतें, किस्से,
सब एहतिमाम रखता हूँ !

रेत के साथ मिट गए
तेरे क़दमों के सारे निशां, 
राह के पत्थरों से अब भी
दुआ सलाम करता हूँ मैं !!!

|||फ़राज़|||

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

मेरा हमदर्द !!!

उसकी बातों में हैं चमकते जुगनू,
और पलकों तले उजली सी सहर रखता है !

उसकी गर्दिश है ज़हन में हर लम्हा,
वो मेरी हर सोच में घर रखता है !

उसकी आहटें है पुरवाइयाँ तसल्ली की,
बनके सबा साँसों में गुज़र रखता है !

है मेरे हवासों में आवारगी उसकी,
वो मेरी सुध-बुध पे असर रखता है !

देखता है तो चाक़ जिगर करता है,
दुश्मन-ए-जां शमशीर-ए-नज़र रखता है !

देखता है तो पुरसुकून सा करता है,
बोलता है तो तबियत में सबर रखता है !

उसका दामन छू जाते हैं मेरे आंसू,
मेरा हमदर्द मेरी खैर ख़बर रखता है !


फ़राज़...

रविवार, 27 नवंबर 2016

सिलसिला

अहसास फ़िर एक दबा सा ढूंढ लिया,
दिल ने दर्द का फ़िर पता ढूंढ लिया !

बेज़ार हो चला था दिल सुकूनियत से,
दिल आज़ारी का फ़िर मरहला ढूंढ लिया !

एक उम्र तलक रहे हैं आवारगी के दिन,
थके हुए क़दमों ने फ़िर आशियाँ ढूंढ लिया !

उससे शिक़ायत क्या करूँ की ग़ैर है वो,
ख़ुद से ही आज फ़िर गिला ढूंढ लिया !

अहसासों को तलाश थी अल्फ़ाज़ों की,
फिर से एक राज़ छुपा सा ढूंढ लिया !

सब इल्ज़ाम मैंने अपने नाम कर लिए,
पर तू न मिला, मैंने बेइन्तेहा ढूंढ लिया !

मेरे तू ख़्वाबों में भी ख़्वाब हो गया,
रतजगों का मैंने सिलसिला ढूंढ लिया !