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शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

आमाल

जब काम बुरा मैं करता हूँ,
तब आईने से डरता हूँ !

कल से अच्छा बन जाऊँगा,
कह कर के रोज़ मुकरता हूँ !

वो जो मेरा गुज़रा कल है,
मैं उससे रोज़ गुज़रता हूँ !

इल्ज़ाम किसीको क्यूँ मैं दूँ,
मैं करता हूँमैं भरता हूँ !

जीने की ख़ातिर इश्क़ किया,
अब इश्क़ की ख़ातिर मरता हूँ !

डर है अपने आमालों का,
वरना कब मौत से डरता हूँ !

मैं अपने सच से वाक़िफ़ हूँ,
'अल्फ़ाज़मैं ख़ुद से डरता हूँ !

||| अल्फ़ाज़ |||

इल्ज़ाम = Allegation, Blame, आरोप
ख़ातिर = For The Sake Of.
आमाल = Deeds, Conducts, कर्म, व्यवहार
वाक़िफ़ = Acquainted With, Aware Of, Informed, जानकार

सोमवार, 15 अप्रैल 2019

हालात

आवारगी के हमपे ज़माने आए,
जबसे हम इस शहर में कमाने आए !

इतनी सी देर को हम घर आते हैं,
जैसे कि कोई क़र्ज़ चुकाने आए !

वक़्त बदला तो फ़िर ऐसा बदला,
तीर पे ख़ुद चल के निशाने आए !

कुछ लोग तेरा ज़िक्र छेड़ देते हैं,
जब आए तो बस आग लगाने आए !

बिछड़ के वो ख़ुश भी हैज़िन्दा भी है,
वादे भी कहाँ उसको निभाने आए !

जागे तो देखा कि तकिया नम था,
कल रात तेरे ख़्वाब सिरहाने आए !

सुर्ख़ जोड़े
 में वो आए मेरी मय्यत पे,
कुछ इस तरह वो हमको जलाने आए !

'अल्फ़ाज़हमने ख़ुद को ख़ुद ही मना लिया,
बहुत देर में वो हमको मनाने आए !

||| अल्फ़ाज़ |||

आवारगी = Wandering, Loitering, Waywardness
ज़माने = Times, Age, Era, काल, समय
क़र्ज़ = Debt, Loan, ऋण, उधार
ख़ुद = Self, Oneself, स्वयं
तीर = Arrow, बाण
ज़िक्र = Narration, Talk, बात, चर्चा
सुर्ख़-जोड़ा = Red Wedding Dress
मय्यत = Dead Body, Corpse, अर्थी, अंतिम-संस्कार

शनिवार, 19 मई 2018

फ़राज़ |||

ख़ुद से जीत जाता हूँ,
जब ख़ुद से जंग करता हूँ !

आसमान छू लेता हूँ,
जब मन पतंग करता हूँ !

रंग नया बन जाता हूँ,

जब ख़ुद को बेरंग करता हूँ !

बे-ज़रूरत सा हो जाता हूँ,
जब मन मलंग करता हूँ !

लिख के अपनी ही हक़ीक़त,
ख़ुद को ही दंग करता हूँ !

एक-तरफ़ा इश्क़ में 'फ़राज़'

ख़ुद को ही तंग करता हूँ !

||| फ़राज़ |||


जंग= Battle, War
बेरंग= Colorless
बे-ज़रूरत= Without The Need
मलंग= Nomad, Dervish
हक़ीक़त= Reality
दंग= Wonder
एक-तरफ़ा= One-Sided
तंग= Distress, Trouble

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

बेघर !!!

एक उम्र से भटकता हूँ
मैं ख़ानाबदोशियों में,
एक ज़माने से मैं
बेघर सा रहता हूँ !

कभी दिल दुख जाये 
तो ख़ुद ही बहला लेता हूँ !
अब फ़िक्रें सोने नहीं देतीं
सुबह जल्दी उठ जाता हूँ ! 

ख़ुद ही संवार लेता हूँ
माथे से फ़िक्रों की सिलवटें
कपड़ों को अब ख़ुद ही
खूँटी पर टांग देता हूँ !

अहमियत अपने पैसों की,
कीमत रिश्तों की भी जानता हूँ !
मिल्लतदारियों, दुनियादारियों का
हिसाब अब मैं ख़ुद ही रखता हूँ !

आईने में अक्सर देखता हूँ
मेरे चेहरे सा एक चेहरा,
आइना बताता है अब
बदला-बदला सा दिखता हूँ !

चादर ख़ुद ही ओढ़ लेता हूँ
अब मैं सोने से पहले !
बारिशों में भी अब अक्सर
मैं कम ही भीगता हूँ !

एक एक्स्ट्रा चम्मच खाना
ख़ुद ही निकाल लेता हूँ !
दिल न भी चाहे तो भी
मन मार के खा लेता हूँ !

अपनी भी ज़िम्मेदारियां
कम नहीं होती हैं 'फ़राज़',
अपने घर से बहुत दूर
मैं बरसों से रहता हूँ !

||| फ़राज़ |||

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

मैं तुझमें सो जाता हूँ !

जब रूठे दिल को अपने
ख़ुद ही बहलाना पड़ता है !
जब मन की हर एक उलझन को
खुद ही सुलझाना पड़ता है !

जब सावन इस मन बंजर को
तुम जैसा सींच नहीं पाता !
और तकिये का एक हिस्सा
जब ख़ाली- ख़ाली लगता है !

तब दिल के इन अंधेरों में
मैं तेरी याद जलाता हूँ !
तू मुझमें जलती रहती है
मैं ही तुझमें सो जाता हूँ !

||| फ़राज़ |||