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रविवार, 22 जुलाई 2018

मुंडेर !

चलो फ़िर से उसे छत पे बुलाया जाए,
चाँद फ़िर से मुंडेर पे लाया जाए !

सुना है उसकी मुस्कान बड़ी महँगी है,

चलो ख़ुद को दांव पे लगाया जाए !

चलो फ़िर से बहाने से उनको देखें,

चलो फ़िर से  पतंगों को उड़ाया जाए !

वो कश्मकश कि कौन पहले बात करे,

बात करने का कोई बहाना बनाया जाए !

शायद मेरी आहट पे चला आये दौड़ के,

चलो दीवार पे कपड़ों को सुखाया जाए !

चलो फिर से नज़र से कोई बात करें,

हाल-ए-दिल इशारों में जताया जाए !

चलो फ़िर से घर पे कोई महफ़िल हो,

सबके बहाने से उनको भी बुलाया जाए !

चलो फिर से ख़ुद को एक अज़ीयत दें,

चलो फ़िर से दिल उनसे लगाया जाए !

चलो चाँद में तकें फ़िर से उनके चेहरे को,

चलो फ़िर रात को जाग के बिताया जाए !

कोई बदनामी न होगी अगर नाम न आये,

बिना नाम लिए 'फ़राज़' उनपे कुछ सुनाया जाए !

||| फ़राज़ |||


कश्मकश= Struggle, Wrangle, Tussle,
हाल-ए-दिल= Condition Of The Heart
महफ़िल= Party, Gathering
अज़ीयत= Trouble, Suffering, Distress
बदनामी= Defame, Ignominy

शनिवार, 19 मई 2018

फ़राज़ |||

ख़ुद से जीत जाता हूँ,
जब ख़ुद से जंग करता हूँ !

आसमान छू लेता हूँ,
जब मन पतंग करता हूँ !

रंग नया बन जाता हूँ,

जब ख़ुद को बेरंग करता हूँ !

बे-ज़रूरत सा हो जाता हूँ,
जब मन मलंग करता हूँ !

लिख के अपनी ही हक़ीक़त,
ख़ुद को ही दंग करता हूँ !

एक-तरफ़ा इश्क़ में 'फ़राज़'

ख़ुद को ही तंग करता हूँ !

||| फ़राज़ |||


जंग= Battle, War
बेरंग= Colorless
बे-ज़रूरत= Without The Need
मलंग= Nomad, Dervish
हक़ीक़त= Reality
दंग= Wonder
एक-तरफ़ा= One-Sided
तंग= Distress, Trouble