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शनिवार, 19 मई 2018

फ़राज़ |||

ख़ुद से जीत जाता हूँ,
जब ख़ुद से जंग करता हूँ !

आसमान छू लेता हूँ,
जब मन पतंग करता हूँ !

रंग नया बन जाता हूँ,

जब ख़ुद को बेरंग करता हूँ !

बे-ज़रूरत सा हो जाता हूँ,
जब मन मलंग करता हूँ !

लिख के अपनी ही हक़ीक़त,
ख़ुद को ही दंग करता हूँ !

एक-तरफ़ा इश्क़ में 'फ़राज़'

ख़ुद को ही तंग करता हूँ !

||| फ़राज़ |||


जंग= Battle, War
बेरंग= Colorless
बे-ज़रूरत= Without The Need
मलंग= Nomad, Dervish
हक़ीक़त= Reality
दंग= Wonder
एक-तरफ़ा= One-Sided
तंग= Distress, Trouble

गुरुवार, 2 मार्च 2017

वो आँखों से ठग लेता है

वो पंछी मेरी मन बगिया
ख़्वाबों को चुनने आता है !
वो आँखों से ठग लेता है
वो बातों से छू जाता है !

बेरंग सी मेरी हस्ती को
वो रंग नए से देता है !
किरदार से काँटों को चुनकर
मन फूलों सा कर देता है !

वो बेफ़िक्री की बातों से
मेरी फ़िक्रें झुठलाता है !
जब आता है वो इस दिल में
सबकुछ रौशन कर देता है !

वो राह है जैसे जन्नत की
ताउम्र मुसाफ़िर हो जाऊं !
उस राह का जोगी बन जाऊं
ताउम्र मुहाजिर हो जाऊं !

एक बेपरवाह मुस्कान सा वो
अक्सर होठों पर आता है !
वो क़तरा आंसू का बनकर
इन आँखों से बह जाता है !

| फ़राज़ |