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सोमवार, 27 अगस्त 2018

सावन

छू जाओ मेरे ज़ख्मों को मरहम की तरह,
बरस जाओ मुझपर घने सावन की तरह !

तेरे ख़याल में इतवार की सी फ़ुर्सत है,
तू पहली बारिश, तू घर के आंगन की तरह !

ये और बात है कि निगाह से दूर रहते हो,
दिल में सदा रहते हो धड़कन की तरह !

दुनिया से बे-फ़िक्र हो जाऊं मैं फ़िर से,
लौट आओ कभी मेरे बचपन की तरह !

रूह प्यासी है किसी सूखे हुए पत्ते की तरह,
कभी मुझपे ठहर जाओ शबनम की तरह !

छू जाओ मेरे ज़ख्मों को मरहम की तरह,
बरस जाओ मुझपर घने सावन की तरह !

||| फ़राज़ |||
















दोस्तों, इस बार आप लोगों की कोई भी एंट्री सेलेक्ट नहीं की जा रही है ! मुझे उम्मीद है की अगली बार आप लोग बेहतर एंट्रीज़ ले कर आयेंगे ! इस बार अल्फ़ाज़ की एक कोशिश पेश की जा रही है !

क्यूँ न खुद से ही मोहब्बत कर के देखें

शुक्रवार, 22 जून 2018

दिल की ज़बानी !!!

सीने से लगा के आपको धड़कन सुनानी है,
दिल ही समझ पाएगा जो दिल की ज़बानी है !

मेरी सुनता है कहाँ दिल जो तेरी सुने,
दिल-ए-नादाँ ने भला कब किसी की मानी है !

मेरी नज़रों से आप कभी ख़ुद को देखिये,
किस क़दर मेरी नज़र आपकी दीवानी है !

तू सैलाब सा बहता है मेरी रग-रग में,
मैं ठहरा समंदर सातू मौज की रवानी है !

तपते सहरा में तेरा साथ है बाईस-ए-सुकूँ,
तू साथ है तो अमावास रात भी नूरानी है !

अब्र के साए सा साथ-साथ चलता है,
तू साथ है तो ख़िज़ाँ भी शादमानी है !

मुझपे बरस जाओ घिर के कभी सावन की तरह,
मैं तपता हुआ सहरातू बारिश का पानी है !

मुझसे हर मोड़ पर तू मिल ही जाता है,
कुछ तो ज़रूर तेरी मेरी कहानी है !

तेरा तसव्वुर भी पाकीज़गी से करता हूँ मैं,
दरमियाँ कुछ तो है ‘फ़राज़’ जो रूहानी है ! 

||| फ़राज़ |||


ज़बानी= By Word Of Mouth, Orally, Verbal, Verbally
दिल-ए-नादाँ= Innocent Heart
ख़ुद= Self
क़दर= Amount
नज़र= Eye, Vision
सैलाब= A Flood, Deluge, Inundation, Torrent
रग= Vein, Artery, Fiber, Nerve
मौज= Wave
रवानी= Fluency, Sharpness, Speed, Flow
सहरा= Desert, Wilderness
बाईस-ए-सुकूँ= Reason For Peace And Tranquility
नूरानी= Luminous, Resplendent
अब्र= Cloud
ख़िज़ाँ= Autumn
शादमानी= Happiness
तसव्वुर= Imagination, Thought
पाकीज़गी= Purity
दरमियाँ= Between
रूहानी= Spiritual

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

मैं तुझमें सो जाता हूँ !

जब रूठे दिल को अपने
ख़ुद ही बहलाना पड़ता है !
जब मन की हर एक उलझन को
खुद ही सुलझाना पड़ता है !

जब सावन इस मन बंजर को
तुम जैसा सींच नहीं पाता !
और तकिये का एक हिस्सा
जब ख़ाली- ख़ाली लगता है !

तब दिल के इन अंधेरों में
मैं तेरी याद जलाता हूँ !
तू मुझमें जलती रहती है
मैं ही तुझमें सो जाता हूँ !

||| फ़राज़ |||

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

तस्कीन



      बरसों तलक खोलता रहा दर्द की परतें,
आज तेरी बातों को मैं मरहम कर लूँ !
बन के आया है तू घने से सावन जैसा,
क्यों न आज रूह को मैं अपनी तर लूँ !

ये तन्हा आग़ोश मेरे दिल में चुभता है,
टूट जाना अगर मैं बाँहों में भर लूँ !
कभी मेरी दीवानगी का तक़ाज़ा भी समझ,
तू मुझमें समाता है मैं सांस अगर लूँ !

एक तस्कीन है वाबस्ता तेरे नाम के साथ,
दिल मेरा बहल जाता है मैं नाम अगर लूँ !
मुसाफ़िर मेरी राहों का आ गया है वापस,
क्यों न ज़िन्दगी को भी हमसफ़र कर लूँ !

फ़राज़...