बरसों तलक खोलता रहा दर्द की परतें,
आज तेरी बातों को मैं मरहम
कर लूँ !
बन के आया है तू घने से
सावन जैसा,
क्यों न आज रूह को मैं अपनी
तर लूँ !
ये तन्हा आग़ोश मेरे दिल में
चुभता है,
टूट जाना अगर मैं बाँहों
में भर लूँ !
कभी मेरी दीवानगी का तक़ाज़ा
भी समझ,
तू मुझमें समाता है मैं
सांस अगर लूँ !
एक तस्कीन है वाबस्ता तेरे
नाम के साथ,
दिल मेरा बहल जाता है मैं
नाम अगर लूँ !
मुसाफ़िर मेरी राहों का आ
गया है वापस,
क्यों न ज़िन्दगी को भी
हमसफ़र कर लूँ !
फ़राज़...