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सोमवार, 21 मई 2018

तसव्वुर-ए-ग़ज़ल !!!

तू न आये, मुझपे तेरा इल्ज़ाम तो आये,
मेरी दीवानगी मेरे भी कुछ काम तो आये !

तू दुआ न सही, बद-दुआ ही दे दे मुझे,
कि तेरे लबों पर मेरा नाम तो आये !

मुझे भी दीवाना कहें, लोग पत्थर मारें,
तेरी आशिक़ी में मेरा वो मक़ाम तो आये !

अभी होश में हूँ मैं, कुछ समझ नहीं आता,
याद सब आ जाएगा, पहले जाम तो आये !

दवा देना है तो दे वरना ज़हर ही दे दे,
मरीज़-ए-इश्क़ को अब आराम तो आये !

कई राज़ मुन्तज़िर हैं कहे जाने को,
जवाब सारे तैयार हैं मगर सलाम तो आये !

तमाशा इश्क़ का हो तो सारी दुनिया देखे,
मेरी तसव्वुर-ए-ग़ज़ल सर-ए-आम तो आये !

मेरा नाम ले के तुझको कोई बदनाम कर दे,
'फ़राज़' के नाम के साथ तेरा नाम तो आये !

||| फ़राज़ |||

इल्ज़ाम= Blame, Accusation
दीवानगी= Madness, Lunacy, Insanity
बद-दुआ= Curse
लब= Lips
आशिक़ी= Love, State Of Being In Love Courtship
मक़ाम= Place, Position
होश= Sense
जाम= Glass Of Wine
मरीज़-ए-इश्क़= Sick Of Love
राज़= Secret
मुन्तज़िर= Expectant, One Who Waits
सलाम= Salutation
तसव्वुर-ए-ग़ज़ल= Imagination/ Contemplation Of An Ode/ Gazal
सर-ए-आम= In Public
बदनाम= Defame

रविवार, 28 मई 2017

बेइख़्तियार !!!

बेइख़्तियार सा मेरा
दिल हो जाता है !
अजब इख़्तियार से तू
दाख़िल हो जाता है !

तसव्वुर-ए-जां पर
हर्फ़ों को ख़र्च करता हूँ !
वो ग़ज़ल बनकर
कामिल हो जाता है !

इश्क़ में दीवानगी के
हज़ार इल्ज़ाम मिले !
आलम-ए-फ़िराक़ में दिल
क़ाबिल हो जाता है !

तेरी तलाश में अक्सर
आँखें बंद कर लेता हूँ !
तू ख़याल सा आँखों में
शामिल हो जाता है !

क्यूँ भला हम रुख़
मयख़ानों का करें !
ख़ुमार तेरे ख़यालों से
हासिल हो जाता है !

|||फ़राज़|||

कामिल= Perfect, Complete, Accomplish, Entire
तसव्वुर--जां= Imagining Of The Beloved
आलम-ए-फ़िराक़= Condition/state of Separation 

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

तस्कीन



      बरसों तलक खोलता रहा दर्द की परतें,
आज तेरी बातों को मैं मरहम कर लूँ !
बन के आया है तू घने से सावन जैसा,
क्यों न आज रूह को मैं अपनी तर लूँ !

ये तन्हा आग़ोश मेरे दिल में चुभता है,
टूट जाना अगर मैं बाँहों में भर लूँ !
कभी मेरी दीवानगी का तक़ाज़ा भी समझ,
तू मुझमें समाता है मैं सांस अगर लूँ !

एक तस्कीन है वाबस्ता तेरे नाम के साथ,
दिल मेरा बहल जाता है मैं नाम अगर लूँ !
मुसाफ़िर मेरी राहों का आ गया है वापस,
क्यों न ज़िन्दगी को भी हमसफ़र कर लूँ !

फ़राज़...

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...

क़तरा वो स्याही सा क़ाग़ज़ पर रह गया,
अश्क़ों की स्याही से अशआर कह गया...
फिर से जो खंगाली दास्तान अपनी,
एक लम्हा आँखों के साहिल से बह गया...

एक झूठी हक़ीकत, एक बिसरी कहानी,
एक आरज़ू ख़्वाब में वो फिर से दे गया...
ये क्या दीवानगी, कि अब भी मुस्कुराता है,
तन्हाइयों के ज़ख्म जो तन्हा ही सह गया...

ये मेरी फुरक़त कि तू नहीं हासिल,
वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...
मुझको भी हुनर अता हो अदाकारी का,
कैसे लिखूं की दूर तू किस तरह गया...

वक़्त की धूल है आइनों पर जम गई,
परछाईंया है मेरी, पर चेहरा रह गया...
जो था मेरी हक़ीकत, ख़ुद ख़्वाब हो गया,
जाने वाले तू ये क्या ताबीर कह गया...