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मंगलवार, 6 मार्च 2018

!!! क़लंदर !!!

ज़िन्दगी बुलबुले जैसी और चाहतें समंदर जैसी,
ये ज़मीन निगल जाती है हस्तियाँ सिकंदर जैसी !

दोस्ती करने से पहले ज़रा तसल्ली कर लेना,
फ़ितरत बग़ल में रखते है लोग ख़ंजर जैसी !

रिश्तों के धागों की ये गिरहें मुझे अखरती हैं,
मुझको भी तरकीब सिखा दे कोई बुनकर जैसी !

मतलबी रिश्तेदारों से तो वो अजनबी बेहतर,
मोहब्बत जहाँ से मिल जाये अपने घर जैसी !

मुख़्तसर सामान ज़िन्दगी के सफ़र के लिए,
मस्तियाँ मन में रखता हूँ क़लंदर जैसी !

हर दिल में ख़ुदा का मुख़्तलिफ़ तसव्वुर है,
मस्जिदें भी तो महज़ इमारत हैं मंदर जैसी !

है ज़रूरी इंसान का महज़ इंसान होना,
'फ़राज़बे-ज़रूरी है हस्ती पैग़म्बर जैसी !

||| फ़राज़ |||

बुलबुले= Bubble
चाहतें= Desires
समंदर= Ocean
हस्तियाँ= Personalities, Lives.
तसल्ली= Satisfaction
फ़ितरत= Nature
अखरना= Annoy, Problematic 
तरकीब= To Feel Bad- Colloquial
बुनकर= Weaver
मुख़्तसर= Limited, Brief
सामान= Luggage, Goods, Provisions
मस्तियाँ= Joys, Intoxications.
क़लंदर= Wandering Ascetic Sufi Dervishes, Ascetic, One Who Has Abandoned Wealth And Worldly Pleasures.
मुख़्तलिफ़ = Different, Various, Unlike
तसव्वुर= Imagination
महज़= Only, Merely
इमारत= A Building, A Structure
मंदर= Temple
बे-ज़रूरी= Unimportant

पैग़म्बर= Prophet

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

तसव्वुर !!!

नींद में तकिये तले ये बुलाता कौन है,
बोझिल मेरी आँखों को ये सुलाता कौन है !

तूने ही शायद अन्दर से दस्तक दिल पे दी होगी,
मेरी दहलीज़ पे आकर मुझको अब बुलाता कौन है !

तू काफ़िर तो न था फ़िर ये तेरे हमशक्ल जैसा,
मयक़दे के दर तलक मुझको ले जाता कौन है !

चलो आज कुछ इल्ज़ाम हम ही कुबूल कर लें,
यूँ भी दिल-ए-नादाँ को अब मनाता कौन है !

दिल-ए-पशेमान भी अब तो ये जानता है,
लड़कपन के वादे आख़िर निभाता कौन है !

मेरे काँधे पे बिखरी तेरी ज़ुल्फ़ तो कब की फिसल गई,
मेरे मन के उलझे धागों को अब सुलझाता कौन है !

एक ख़ामोश मोहब्बत और कुछ बदनाम फ़साने,
मुद्दतों तलक कुछ अख़बार भला जलाता कौन है !

तू तसव्वुर है उसका तो चल तू ही बता,
हक़ीकत से मेरी अब मुझको डराता कौन है !

चल सो जाएं ‘फ़राज़’ कि मन आज रूठा सा है,
देखते हैं ख़्वाब में आज मनाने आता कौन है !

||| फ़राज़ |||

रविवार, 28 मई 2017

बेइख़्तियार !!!

बेइख़्तियार सा मेरा
दिल हो जाता है !
अजब इख़्तियार से तू
दाख़िल हो जाता है !

तसव्वुर-ए-जां पर
हर्फ़ों को ख़र्च करता हूँ !
वो ग़ज़ल बनकर
कामिल हो जाता है !

इश्क़ में दीवानगी के
हज़ार इल्ज़ाम मिले !
आलम-ए-फ़िराक़ में दिल
क़ाबिल हो जाता है !

तेरी तलाश में अक्सर
आँखें बंद कर लेता हूँ !
तू ख़याल सा आँखों में
शामिल हो जाता है !

क्यूँ भला हम रुख़
मयख़ानों का करें !
ख़ुमार तेरे ख़यालों से
हासिल हो जाता है !

|||फ़राज़|||

कामिल= Perfect, Complete, Accomplish, Entire
तसव्वुर--जां= Imagining Of The Beloved
आलम-ए-फ़िराक़= Condition/state of Separation