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गुरुवार, 7 मार्च 2019

ऐलान

भूख हैबेरोज़गारी है,
पर सबपे मज़हब भारी है!

झूठी ही सहीतारीफ़ करो,
ऐलान हुआ सरकारी है !

अपना किरदार दिखाओ तुम,
अबकी सरकार तुम्हारी है !

उससे मज़हब से ख़ौफ़ नहीं,
जिस दिल से दिल की यारी है !

हम इस पर सजदा करते हैं,
धरती ईमान हमारी है !

कुफ्फ़ार भला क्या कर पाता,
ये क़ौम ही ख़ुद से हारी है !

कोई ज़ाहिर काकोई बातिन का,
इन्साँ फ़ितरत से पुजारी है !

'अल्फ़ाज़' ग़ज़ल ही लिखा कर,
ख़बरों पर पहरेदारी है !

||| अल्फ़ाज़ |||

मज़हब = Religion, धर्म
तारीफ़ = Praise, प्रशंसा
ऐलान = Declaration; Proclamation, Order
सरकारी = Governmental, Official, राजकीय, हुकूमती
किरदार = Character, Conduct, Deed, Manner, आचरण, व्यवहार,
ख़ौफ़ = Fear, Dread, Terror, भय
सजदा = Bowing In Prayer So As To Touch The Ground With The Forehead, शीश नमन
धरती = Land, Mother Earth, 
ईमान = Belief, Conscience, Faith
कुफ्फ़ार = Pagan, Infidel, Unbeliever, ग़ैर-मुस्लिम
क़ौम = People, Race, जाति, बिरादरी
ज़ाहिर = Evident, Open, प्रत्यक्ष
बातिन = Internal, Hidden, अप्रत्यक्ष,
इन्साँ =  Human Being, Mankind, मनुष्य
फ़ितरत = Creation, Nature, प्रकृति, स्वभाव,
पुजारी = Priest, Worshipper

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

हसरत

पाँवों को फैलाने की फ़ितरत का क्या करूँ,
चादर का नहीं दोषमैं हसरत का क्या करूँ !

ऐ काश भुला पाता तुम्हे मैं भी मुकम्मल,
शिकवे तो भूल जाऊँमोहब्बत का क्या करूँ !

तुमको है यही ज़िद कि भुला दूँ तुम्हें मैं भी,
ख़्वाहिश तो छोड़ दूँ मैं आदत का क्या करूँ !

ज़िद छोड़ दूँ तेरी मगर मसअला है कुछ अलग,
हसरत तो दबा लूँमैं ज़रुरत का क्या करूँ !

अच्छी तरह पहचानता हूँ मैं तेरे मुखौटे,
सीरत तेरी बुरी है तो सूरत का क्या करूँ !

हर इल्ज़ाम गवारा था तेरे इश्क़ में हमको,
तू ही नहीं तो मैं तेरी तोहमत का क्या करूँ !

रुक जायेगा तूने अगर सोचा कभी ऐसा,
मेहनत में न कमी थी मैं क़िस्मत का क्या करूँ !

'अल्फ़ाज़मैं क्या पाउँगा हो कर के जन्नती,
जब यार हों  दोज़ख़ में तो जन्नत का क्या करूँ !

||| अल्फ़ाज़ |||

फ़ितरत= Nature
दोष= Fault, Sin
हसरत= Unfulfilled Desire
मुकम्मल= Complete
शिक़वा= Complaint, Reproach
ख़्वाहिश= Wish, Inclination
मसअला= Problem, Matter,
मुखौटे= Mask
सीरत= Quality, Disposition, Character
इल्ज़ाम= Accusation, Charge, Blame
गवारा= Bearable, Tolerable
तोहमत= Allegation, Accuse
जन्नतीDweller In Paradise
दोज़ख़= Hell

मंगलवार, 6 मार्च 2018

!!! क़लंदर !!!

ज़िन्दगी बुलबुले जैसी और चाहतें समंदर जैसी,
ये ज़मीन निगल जाती है हस्तियाँ सिकंदर जैसी !

दोस्ती करने से पहले ज़रा तसल्ली कर लेना,
फ़ितरत बग़ल में रखते है लोग ख़ंजर जैसी !

रिश्तों के धागों की ये गिरहें मुझे अखरती हैं,
मुझको भी तरकीब सिखा दे कोई बुनकर जैसी !

मतलबी रिश्तेदारों से तो वो अजनबी बेहतर,
मोहब्बत जहाँ से मिल जाये अपने घर जैसी !

मुख़्तसर सामान ज़िन्दगी के सफ़र के लिए,
मस्तियाँ मन में रखता हूँ क़लंदर जैसी !

हर दिल में ख़ुदा का मुख़्तलिफ़ तसव्वुर है,
मस्जिदें भी तो महज़ इमारत हैं मंदर जैसी !

है ज़रूरी इंसान का महज़ इंसान होना,
'फ़राज़बे-ज़रूरी है हस्ती पैग़म्बर जैसी !

||| फ़राज़ |||

बुलबुले= Bubble
चाहतें= Desires
समंदर= Ocean
हस्तियाँ= Personalities, Lives.
तसल्ली= Satisfaction
फ़ितरत= Nature
अखरना= Annoy, Problematic 
तरकीब= To Feel Bad- Colloquial
बुनकर= Weaver
मुख़्तसर= Limited, Brief
सामान= Luggage, Goods, Provisions
मस्तियाँ= Joys, Intoxications.
क़लंदर= Wandering Ascetic Sufi Dervishes, Ascetic, One Who Has Abandoned Wealth And Worldly Pleasures.
मुख़्तलिफ़ = Different, Various, Unlike
तसव्वुर= Imagination
महज़= Only, Merely
इमारत= A Building, A Structure
मंदर= Temple
बे-ज़रूरी= Unimportant

पैग़म्बर= Prophet

रविवार, 26 नवंबर 2017

नाख़ुदा !!!

नदामत नहीं फ़राज़ फ़ितरत उसकी,
तूने इल्ज़ाम ही उसपर बेवजह रखा !
देख वो ही चला गया लूट कर तुझको,
दरवाज़ा जिसके लिए था खुला रखा !

ज़हन यूँ तो ज़िम्मेदार हो चला है,
दिल को फ़िर भी मैंने मनचला रखा !
मेहमानदारियां दिल में तो चला करती हैं,
ज़हन को अगरचे है मैंने तन्हा रखा !

तेरा ख़याल आया तो ग़ज़ल लिख दी,
यूँ अपने दिल को मैंने शादमां रखा !
तेरी आबरू की परवाह भी है मुझको,
तेरा नाम ग़ज़लों से अलाहिदा रखा !

रहबरों की परख नहीं आती मुझको,
एक रहज़न को था मैंने नाख़ुदा रखा !
चल तू ही दिल का इन्साफ़ कर दे,
इस दिल ने तेरा नाम है ख़ुदा रखा !

|||फ़राज़|||

नदामत= Regret, Shame, Repentance.
फ़ितरत= Nature
इल्ज़ाम= Blame, Acquisition, Allegation
बेवजह= without cause.
ज़हन= Mind.
तन्हा= Lonely, Alone.
अगरचे= Although
शादमां= Happy
आबरू= Dignity
अलाहिदा= Separate, Apart
रहबर= Guide
रहज़न= Robber.
नाख़ुदा= Master or commander of the ship, sailor, boatman.
इन्साफ़= Justice.

मंगलवार, 7 मार्च 2017

वो इन्सान है आख़िर !!!

लुटा दिल देख कर अपना
तू क्यूँ हैरान है आख़िर,
लुटेरा तेरी दुनिया का
तेरी ही जान है आख़िर,
बनाया था ख़ुदा जिसको
कभी तूने मोहब्बत का,
बदल जाना ही फ़ितरत थी
कि वो इन्सान है आख़िर !
 
कि हर तस्बीह में हमने
तेरा ही नाम दोहराया,
सदाएं लाख तुझको दीं
तू फ़िर न लौट कर आया,
तू दामन में जगह दे दे
मेरी आंसू के मोती को,
ज़रा रख ले हिफ़ाज़त से
तेरी पहचान हैं आख़िर !
 
सर-ए-शमशीर के जैसी
रिवायत थीं ज़माने की,
हमें थी तोड़ने की ज़िद
तुम्हें आदत निभाने की,
तेरी मनमानियों की पैरवी
करते रहे दिल से,
यही आग़ाज़ मेरा था
यही अंजाम है आख़िर !!!

||| फ़राज़ |||  

आख़िर= After All, At The End
फ़ितरत= Nature
तस्बीह= Rosary, Chaplet Of Beads, String Of Beads
सदाएं= Voices
दामन= Hem, Border
हिफ़ाज़त= Guarding, Preserving, Custody, Protection
सर-ए-शमशीर Edge Of The Sword.
रिवायत= Traditions, Norms
पैरवी= Prosecution, Recommendation.
आग़ाज़= Starting, Beginning, Genesis
अंजाम= End, Fate