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रविवार, 26 नवंबर 2017

नाख़ुदा !!!

नदामत नहीं फ़राज़ फ़ितरत उसकी,
तूने इल्ज़ाम ही उसपर बेवजह रखा !
देख वो ही चला गया लूट कर तुझको,
दरवाज़ा जिसके लिए था खुला रखा !

ज़हन यूँ तो ज़िम्मेदार हो चला है,
दिल को फ़िर भी मैंने मनचला रखा !
मेहमानदारियां दिल में तो चला करती हैं,
ज़हन को अगरचे है मैंने तन्हा रखा !

तेरा ख़याल आया तो ग़ज़ल लिख दी,
यूँ अपने दिल को मैंने शादमां रखा !
तेरी आबरू की परवाह भी है मुझको,
तेरा नाम ग़ज़लों से अलाहिदा रखा !

रहबरों की परख नहीं आती मुझको,
एक रहज़न को था मैंने नाख़ुदा रखा !
चल तू ही दिल का इन्साफ़ कर दे,
इस दिल ने तेरा नाम है ख़ुदा रखा !

|||फ़राज़|||

नदामत= Regret, Shame, Repentance.
फ़ितरत= Nature
इल्ज़ाम= Blame, Acquisition, Allegation
बेवजह= without cause.
ज़हन= Mind.
तन्हा= Lonely, Alone.
अगरचे= Although
शादमां= Happy
आबरू= Dignity
अलाहिदा= Separate, Apart
रहबर= Guide
रहज़न= Robber.
नाख़ुदा= Master or commander of the ship, sailor, boatman.
इन्साफ़= Justice.