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शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

तड़प

कुन पे फ़या कुन मुझे होती नहीं हासिल,
शायद मेरी तड़प ही अभी है नहीं कामिल !

रूठा है इतना मुझसे कि मरहम तो छोड़िये,
रब मुझपे तो अज़ाब भी करता नहीं नाज़िल !

काग़ज़ की कश्तियों सी हसरत न पालिए,
काग़ज़ की कश्तियों के होते नहीं साहिल !

वो हैं नहीं जाहिल कि जो मक़तब नहीं गए,
पढ़-लिख के बेशऊर हैंवो लोग हैं जाहिल !

उस आम सी हसीं में कुछ ख़ास है ज़रूर,
हर एक से तो दिल ये होता नहीं माइल !

क्या बात है दिलों की बस जानता है दिल,
समझेगा ज़हन कैसे, दिल की है क्या मुश्किल !

रंगीन मह्फ़िलों में वासिल जो यार थे,
बरबादियों में मेरी क्यूँ हैं नहीं शामिल !

इंसाफ़ की मीज़ान पे गर तौलिये ख़ुद को,
आदिल भी तेरे अद्ल के हो जायेंगे क़ाइल !

'अल्फ़ाज़अपनी शह से हम मात खा गए,
शायद है दोस्तों में दुश्मन कोई शामिल !


||| अल्फ़ाज़ ||

कुन फ़याकुन = Be And It Happens-Command Of God
हासिल = Gain, Result
कामिल = Perfect, Complete
मरहम = Ointment
अज़ाब = Torment, Agony
नाज़िल  = Descending, Arriving At
काग़ज़ = Paper
कश्ती = A Boat, A Ship,
हसरत = Unfulfilled Desire
साहिल = The Sea-Shore, Beach, Coast
जाहिल = Illiterate
मकतब = School, Academy
बे-शऊर = Immoral, Improper, Indecent. 
आम= Common, General
हसीं= Beautiful
माइल= Inclined, Attracted, Bent
ज़हन= Mind,
महफ़िल= Assembly, Gathering, Party
वासिल= Joined, One Who Meets, Connected Together
इंसाफ़= Justice, Fair Play, Equity
मीज़ान= Balance, Scale
आदिल= Just, Justice
अद्ल= Justice, Equity, Fairness, Fair-Play
क़ाइल= Agree, Consent, Convince, 

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

सियासत !!!

उन्हें क्यूँ डर है लोगों सेकि कोई मार डालेगा,
सियासतदानों की इतनी हिफ़ाज़त भी नहीं अच्छी !

लड़ा कर के मज़ाहिब कोतमाशा देखने वालों,
इबादतगाह पर इतनी सियासत भी नहीं अच्छी !

वो हिन्दू या मुसलमां हो. कोई कलमा वो पढ़ता हो,
ग़लत इंसान से तो मुसाफ़त भी नहीं अच्छी !

ज़बाँ का लाख मीठा हैमगर नीयत का खोटा है,
फ़रेबी हुक्मरानों की इताअत भी नहीं अच्छी !

कहाँ इंसाफ़ मिलना हैअदालत भी तो उनकी है,
कि इस सरकार से इंसाफ़ की चाहत भी नहीं अच्छी !

कलम की खाते हो तो तुम कलम की लाज भी रखो
सफ़ेदपोशों की इतनी ख़ुश-किताबत भी नहीं अच्छी !

ठगे जाते हैं वो अक्सरजो नीयत साफ़ रखते हैं !
'फ़राज़इस दौर में इतनी शराफ़त भी नहीं अच्छी !

||| फ़राज़ |||

सियासतदान= Politician
हिफ़ाज़त= Protection
मज़ाहिब= Religions 
इबादतगाह= Place Of Worship
सियासत= Politics
कलमा= Word, Saying, The Muslim Confession Of Faith
मुसाफ़त= To Join Hands, To Join In a League,  To Unite, 
ज़बाँ= Tongue, Speech
फ़रेबी= Fraud, Cheat, Dishonest
हुक्मरान= Rural, King
इताअत= Obedience, Submission.
इंसाफ़= Justice
सफ़ेदपोश= White-Collar
ख़ुश-किताबत= To Write Nice Things

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

शब्-ए-तन्हाई !!!

शब्-ए-तन्हाई थी, कि काटे नहीं कटती थी,
बस इसी वास्ते मैं एक जाम ख़रीद लाया हूँ !

जानता हूँ कि ये मरहम भी कामिल तो नहीं है,
कुछ लम्हों का सही, मैं आराम ख़रीद लाया हूँ !

अब दोस्तों पे ख़र्च करूँ, या तसव्वुर-ए-यार पर,
दिन भर की कमाई से मैं ये शाम ख़रीद लाया हूँ !

ये ज़माना एक दिन तुझको भी दीवाना कहेगा,
मैं भी इश्क़ करके एक इल्ज़ाम ख़रीद लाया हूँ !

सिर्फ़ दिल-ए-नादाँ ही उसकी उम्मीद लगाये बैठा है,
यूँ तो मैं अपनी मौत का हर सामान ख़रीद लाया हूँ !

बता कैसे हरायेगा अब तू मुझे इंसाफ़ के खेल में,
तू वकील ही तो लाया है, मैं हुक्काम ख़रीद लाया हूँ !

तुझसे ही सीखा है मैंने सियासत का सबक़,
मैं भी ईमान बेचकर आवाम ख़रीद लाया हूँ !

आज फ़िर मेरे ज़मीर को कोई ख़रीद न सका,
मैं न बिक कर भी अपना दाम ख़रीद लाया हूँ !

वो रंगीन गुब्बारे इतने महंगे भी न लगे 'फ़राज़',
मैं किफ़ायत से बच्चों की मुस्कान ख़रीद लाया हूँ !

||| फ़राज़ |||

शब्-ए-तन्हाई= Night of loneliness.
वास्ते= For, for the cake of, 
जाम= Glass of wine.
मरहम= Ointment.
कामिल= Perfect, Complete.
तसव्वुर-ए-यार= Thinking about the beloved.
इल्ज़ाम= Blame, Accusation
दिल-ए-नादाँ= Innocent heart.
इंसाफ़= Justice
वकील= Lawyer, Advocate
हुक्काम= Judges, Magistrate, Authorities.
सियासत= Politics, Administration.
ईमान= Conscience, Faith.
आवाम= Public, Common People.
ज़मीर= Conscience, Heart, Pronoun.
किफ़ायत= Economy, careful management of money.

रविवार, 26 नवंबर 2017

नाख़ुदा !!!

नदामत नहीं फ़राज़ फ़ितरत उसकी,
तूने इल्ज़ाम ही उसपर बेवजह रखा !
देख वो ही चला गया लूट कर तुझको,
दरवाज़ा जिसके लिए था खुला रखा !

ज़हन यूँ तो ज़िम्मेदार हो चला है,
दिल को फ़िर भी मैंने मनचला रखा !
मेहमानदारियां दिल में तो चला करती हैं,
ज़हन को अगरचे है मैंने तन्हा रखा !

तेरा ख़याल आया तो ग़ज़ल लिख दी,
यूँ अपने दिल को मैंने शादमां रखा !
तेरी आबरू की परवाह भी है मुझको,
तेरा नाम ग़ज़लों से अलाहिदा रखा !

रहबरों की परख नहीं आती मुझको,
एक रहज़न को था मैंने नाख़ुदा रखा !
चल तू ही दिल का इन्साफ़ कर दे,
इस दिल ने तेरा नाम है ख़ुदा रखा !

|||फ़राज़|||

नदामत= Regret, Shame, Repentance.
फ़ितरत= Nature
इल्ज़ाम= Blame, Acquisition, Allegation
बेवजह= without cause.
ज़हन= Mind.
तन्हा= Lonely, Alone.
अगरचे= Although
शादमां= Happy
आबरू= Dignity
अलाहिदा= Separate, Apart
रहबर= Guide
रहज़न= Robber.
नाख़ुदा= Master or commander of the ship, sailor, boatman.
इन्साफ़= Justice.