उन्हें क्यूँ डर है लोगों से, कि कोई मार डालेगा,
सियासतदानों की इतनी हिफ़ाज़त भी नहीं अच्छी !
लड़ा कर के मज़ाहिब को, तमाशा देखने वालों,
इबादतगाह पर इतनी सियासत भी नहीं अच्छी !
वो हिन्दू या मुसलमां हो. कोई कलमा वो पढ़ता हो,
ग़लत इंसान से तो मुसाफ़त भी नहीं अच्छी !
ज़बाँ का लाख मीठा है, मगर नीयत का खोटा है,
फ़रेबी हुक्मरानों की इता’अत भी नहीं अच्छी !
कहाँ इंसाफ़ मिलना है, अदालत भी तो उनकी है,
कि इस सरकार से इंसाफ़ की चाहत भी नहीं अच्छी !
कलम की खाते हो तो तुम कलम की लाज भी रखो
सफ़ेदपोशों की इतनी ख़ुश-किताबत भी नहीं अच्छी !
ठगे जाते हैं वो अक्सर, जो नीयत साफ़ रखते हैं !
'फ़राज़' इस दौर में इतनी शराफ़त भी नहीं अच्छी !
||| फ़राज़ |||
सियासतदान= Politician
हिफ़ाज़त= Protection
मज़ाहिब= Religions
इबादतगाह= Place Of Worship
सियासत= Politics
कलमा= Word, Saying, The Muslim Confession Of Faith
मुसाफ़त= To Join Hands, To Join In a League, To Unite,
ज़बाँ= Tongue, Speech
फ़रेबी= Fraud, Cheat, Dishonest
हुक्मरान= Rural, King
इता’अत= Obedience, Submission.
इंसाफ़= Justice
सफ़ेदपोश= White-Collar
ख़ुश-किताबत= To Write Nice Things
ख़ुश-किताबत= To Write Nice Things