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शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

सियासत !!!

उन्हें क्यूँ डर है लोगों सेकि कोई मार डालेगा,
सियासतदानों की इतनी हिफ़ाज़त भी नहीं अच्छी !

लड़ा कर के मज़ाहिब कोतमाशा देखने वालों,
इबादतगाह पर इतनी सियासत भी नहीं अच्छी !

वो हिन्दू या मुसलमां हो. कोई कलमा वो पढ़ता हो,
ग़लत इंसान से तो मुसाफ़त भी नहीं अच्छी !

ज़बाँ का लाख मीठा हैमगर नीयत का खोटा है,
फ़रेबी हुक्मरानों की इताअत भी नहीं अच्छी !

कहाँ इंसाफ़ मिलना हैअदालत भी तो उनकी है,
कि इस सरकार से इंसाफ़ की चाहत भी नहीं अच्छी !

कलम की खाते हो तो तुम कलम की लाज भी रखो
सफ़ेदपोशों की इतनी ख़ुश-किताबत भी नहीं अच्छी !

ठगे जाते हैं वो अक्सरजो नीयत साफ़ रखते हैं !
'फ़राज़इस दौर में इतनी शराफ़त भी नहीं अच्छी !

||| फ़राज़ |||

सियासतदान= Politician
हिफ़ाज़त= Protection
मज़ाहिब= Religions 
इबादतगाह= Place Of Worship
सियासत= Politics
कलमा= Word, Saying, The Muslim Confession Of Faith
मुसाफ़त= To Join Hands, To Join In a League,  To Unite, 
ज़बाँ= Tongue, Speech
फ़रेबी= Fraud, Cheat, Dishonest
हुक्मरान= Rural, King
इताअत= Obedience, Submission.
इंसाफ़= Justice
सफ़ेदपोश= White-Collar
ख़ुश-किताबत= To Write Nice Things

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

वतन और मज़हब !

मुताला क़ुर'आन से है कि वतनपरस्ती ईमान है,
मेरा क़ायदा इस्लाम है, और मज़हब हिन्दोस्तान है !

मेरी दीवार पर हिंदी में लिखो अल्लाह का नाम,
मेरी बुनियाद तो उर्दू है पर हिंदी मेरा दालान है !

तुम न कर पाओगे बंटवारा मेरी तहज़ीब का,
उर्दू तो मेरी क़ौम है मगर हिंदी मेरी पहचान है !

एक माँ की मोहब्बत, दूजी बहन के प्यार जैसी है,
मेरा अंदाज़-ए-बयां उर्दू है, हिंदी-रवां मेरी ज़ुबान है !

ख़ुदाओं की सियासत करते हैं ख़ुदा बेचने वाले,
जो उनकी इता'अत करते हैं वो भी कितने नादान हैं !

मय्यतें भला कब पूछती हैं कन्धों का मज़हब,
फ़िर भी ता-ज़िन्दगी मज़हब का ही इम्तिहान है !

ज़ुल्म बेज़ुबां पर हो तो वो भी शोर करता है,
हम क्यूँ लब-कुशा नहीं, यूँ तो हम बाज़ुबां हैं !

एक ही जोड़े की तो नस्ल सब इंसान हैं 'फ़राज़',
मज़हब मुख़्तलिफ़ सही, मगर एक ही ख़ानदान है ! 

यहीं सुनी पहली अज़ान, यहीं नमाज़-ए-आख़िर होगी,
यहीं मेरा पहला घर है और यहीं आख़िरी मकान है !

माना की पुरखों ने निभाए हैं झगड़े इबादतगाहों के,
चलो अब मिलकर सुलझा लें, हम लोग तो नौजवान हैं !

|||फ़राज़|||

मुताला= Study, Reference. 
क़ुर'आन= The Holy Quran. 
वतनपरस्ती= Patriotism.
ईमान= Belief, Conscience, Faith, Creed.
क़ायदा= Rule, System.
इस्लाम= The religion proclaimed by the Holy Prophet Mohammed (P.B.U.H.)
मज़हब= Religion.
बुनियाद= Foundation, Elementry, Basic.
दालान= Verandah.
तहज़ीब= Adorning, Politeness.
क़ौम= Tribe, Race, People.
दूजी= Other, Second.
अंदाज़-ए-बयां= Style of narration
हिंदी-रवां= Active/Souled in the Hindi Language.
ज़ुबान= Dialect, Language, Tongue.
सियासत= Politics.
इता'अत= Obedience.
नादान= Foolish, Innocent
मय्यत= Dead body, Corpse.
मज़हब= Religion.
ता-ज़िन्दगी= Till the end of life, All life.
इम्तिहान= Test, Exam.
ज़ुल्म= Oppression, Injustice.
बेज़ुबां= Speechless, Dumb.
लब-कुशा= Opened lips.
बाज़ुबां= One who can speak.
जोड़ा= Couple.
नस्ल= Breed, Caste, Pedigree
मुख़्तलिफ़= Different Unlike.
ख़ानदान= Family.
अज़ान= The Islamic call to prayer.
नमाज़-ए-आख़िर= The Islamic Funeral Prayer. The final prayer.
पुरखे= Ancestors.
इबादतगाह= A Place of worship.

सोमवार, 21 अगस्त 2017

ख़ुदा!!

उसे मकानों में न ढूंढ
कि वो मकीं में मिलेगा,
आसमानवाला है वो
लेकिन ज़मीं पे मिलेगा !

क्यूँ तलाशता है ख़ुदा को
तू इबादतगाहों में,
वो बेशक्ल है लेकिन
हर आदमी में मिलेगा !

जाने कैसी ये हमाहमी
ये शोर उसके नाम का,
उसे तन्हाई में पुकार ले
वो ख़ामोशी में मिलेगा !

ख़ुदा ही जाने हक़ीकत
जन्नत-ओ-दोज़ख़ की,
तुझे तेरी करनी का सिला
इसी ज़िन्दगी में मिलेगा !

बहुत नाज़ है तुझे 
अपने इल्म पर ऐ ग़ाफ़िल,
वो बेज़रूरत है फ़राज़
वो बेख़ुदी में मिलेगा !

गर हो सके तो
किसीका ग़मख़्वार हो जा,
इबादत का अस्ल मज़ा
तुझे चाराग़री में मिलेगा !

|||फ़राज़|||

मकीं= Resident, Inhabitant.
इबादतगाह= A place of worship, A mosque, A temple, A church.
बेशक्ल= Faceless, The divine energy, God.
हमाहमी= Hustle-Bustle
जन्नत-ओ-दोज़ख़Heaven and Hell.
सिला= Reward.
नाज़= Pride.
इल्म= Knowledge, Learning.
ग़ाफ़िल= Negligent, Neglectful
बेज़रूरत = Without need.
बेख़ुदी= Intoxication
ग़मख़्वार= Consoler, Sympathizer, Comforter.
इबादत= Worship, Prayer, Adoration.

चाराग़री= Curing, Remedial

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

लोग !

क़ैद करते हैं परिंदों को पिंजरों में
आज़ादी-ए-वतन पर इतराते हैं लोग !

करते हैं फ़साद इबादतगाहों की ख़ातिर
इबादत में वक़्त कम ही बिताते हैं लोग !

अक्सर देते हैं हवाले मसरूफ़ियात के
अब लोगों के काम कहाँ आते हैं लोग !

करते हैं इश्तेहार लोगों की ख़ताओं का
अपने गिरेबां में झाँक कहाँ पाते है लोग !

सब कहाँ पाते हैं यहाँ आसमान नया
रास्ते औरों के ही अक्सर दोहराते हैं लोग !

करते हैं वक़ालत लोग इश्क़दारी की
भूल पाने का हुनर कहाँ बताते हैं लोग !

हर जिंदा बशर में ऐब ढूंढ लेने वाले
मय्यतों पर यहाँ सोज़ मनाते हैं लोग !

||| फ़राज़ |||