बे-वजह किसीके लिए अब मुस्कुराता कौन है ?
भटके
हुए को रास्ता अब दिखलाता कौन है ?
इंसान तो अब इंसान के भी काम नहीं आता,
परिंदों को आजकल पानी
पिलाता कौन है ?
इंसानियत को हिस्से में बांटने वाली,
ज़मीन
पर ये लकीरें बिछाता कौन
है ?
सरहद के पार सब दुश्मन ही रहते हैं,
अफ़वाह दोनों ही तरफ
ये फैलाता कौन है ?
लोग तो एक पल में रिश्ते भुला देते हैं,
रंजिशें कभी मगर भूल
पाता कौन है ?
जिस ख़ुदा को तेरा क़ानून मानता ही नहीं,
उसकी
कसम मेरे क़ातिल को खिलाता
कौन है ?
मेरा आक़ीदा है तो इबादत करता हूँ,
नज़र
से ख़ुदा को देख पाता कौन है ?
दाढ़ी पहचान हो गई दहशतगर्दी की,
इस्लाम की ये तस्वीर
बनाता कौन है ?
सुना है 'फ़राज़' कि अच्छे दिन आयेंगे,
इस
बार ये लतीफ़ा सुनाता कौन
है ?
||| फ़राज़ |||
बे-वजह= Without cause,
परिंदे=
Birds
इंसानियत=
Humanity
लकीर= Line, Streak
सरहद= Border, Boundary
अफ़वाह=
Rumor
रंजिश=
Enmity, ill-will/ hostility
क़ातिल=
Murderer
आक़ीदा=
Faith, Fundamental Doctrine of Belief, Tenet
इबादत=
Prayers, Adoration
दाढ़ी= Beard
दहशतगर्दी=
Terrorism,
इस्लाम=
The religion of the Muslims
लतीफ़ा=
Joke