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गुरुवार, 10 जनवरी 2019

वक़्त

दर्द थम जाएगाज़ख़्म भर जाएगा,
वक़्त अच्छा-बुरा सब गुज़र जाएगा !

जाना चाहे अगर वो तो जाने दे तू,
वो है तेरा तो फ़िर लौटकर आएगा !

लोग कहते हैं कि इश्क़ है इक नशा,
क्या नशे की तरह ही उतर जाएगा !

गर मिटा दूँ हथेली से उसकी लकीर,
मेरा बिगड़ा नसीबा संवर जायेगा !

उसके वादे-वफ़ा तू भी कर दे क़ज़ा,
बोझ दिल से वफ़ा का उतर  जाएगा !

मुझसे बेहतर परिंदे की तक़दीर है,
शाम को लौट कर अपने घर जाएगा !

हूँ मैं झूठा तो तुम आईना देख लो,
झूठ क्यासच है क्यासब नज़र आएगा !

रंगतें वो ही 'अल्फ़ाज़होंगी असल,
जिस्म का जब मुखौटा उतर जायेगा !

||| अल्फ़ाज़ |||

नसीबा= Fortune, Destiny
वादे-वफ़ा= Promise Of Love/Fulfillment/ Fidelity/ Faithful
क़ज़ा= Death, Lapse
वफ़ा= Love/Fulfillment, Fidelity, Faithful
बेहतर= Better
परिंदा= Bird
तक़दीर= Divine Decree, Fate, Destiny
रंगत= Colour, Form, Condition
असल= Real, Original
मुखौटा= Mask

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

मैं

अच्छा हूँ,  कुछ बुरा हूँ,
मैं भी तेरी तरह हूँ  !

किस बात का तकब्बुर,
मिट्टी का मैं बना हूँ !

मेरी तड़प क्या जानो !
पिंजरे का परिंदा हूँ !

डर तो है ज़िन्दगी का,
कब मौत से डरा हूँ !

रिश्तों की डोर की मैं,
नाज़ुक सी एक गिरह हूँ ! 

हर ज़ख़्म का हूँ मरहम,
हर रोग की दवा हूँ !

क्यूँ हो भँवर की परवाह,
मैं खुद का नाख़ुदा हूँ !

टूटा है जब से ये दिल,
मैं ख़ुद का हुक्मराँ हूँ !

पुरवाई का हूँ झौंका,
मौसम मैं इक नया हूँ !

ऊपर को ही उठूँगा
,
'अल्फ़ाज़मैं धुआँ हूँ !

||| अल्फ़ाज़ |||

तकब्बुर= Pride, Arrogance, Haughtiness
परिंदा= Bird
नाज़ुक= Delicate, Thin
गिरह= A Knot, A Joint, 
मरहम= Remedy, Ointment
भँवर= Whirlpool Vortex
परवाह= Care, Concern
नाख़ुदा= Boatman, Sailor, The Master/Commander Of A Ship
हुक्मराँ= Ruler

गुरुवार, 7 जून 2018

उम्र-ए-दराज़ !!!

जिस्मों की तो आदत है, मिल करके बिछड़ जाना,
तुम मिलना तो ऐसे मिलना कि रूह में उतर जाना !

मुड़कर के हमने देखा, जब अपनी ज़िन्दगी को,
उम्र--दराज़ बस एक लम्हे का गुज़र जाना !

बेफ़िक्र किस क़दर था वो इश्क़ का ज़माना,
कर के तेरा तसव्वुर आठों पहर जाना !

मुझसे तेरी नज़र का पहले-पहल वो मिलना,
सदियों की गर्दिशों का लम्हें में ठहर जाना !

वो जाते-जाते तेरा मुड़कर के मुस्कुराना,
एक रूठती सी किस्मत का फ़िर से संवर जाना !

सब झूठ तो नहीं है, एक बात वो भी सच थी,
ज़िक्र--फ़िराक़ से तेरी आँखों का वो भर जाना !

देखा जो परिंदों को, तो याद आया हमको,
वो शामों का ढलना, वो लौट के घर जाना !

इस बार तो इतना भी तक़दीर में नहीं है,
हो ईद का बहाना और अपने शहर जाना !

||| फ़राज़ |||

जिस्म= Body, Material, Substance
रूह= Soul, Spirit, The Vital Principle
उम्र--दराज़= Long Life
लम्हा= Moment
बेफ़िक्र= Carefree
क़दर= Amount, Appreciation, 
ज़माना= Era
तसव्वुर= Imagination, Thought
पहर= Period Of Time, An 8th Hour Of A Day.
पहले-पहल= Initially, The First Time.
सदियों= Centuries, Centenaries
गर्दिशों= Revolution, Circulation, Misfortune
ज़िक्र--फ़िराक़= Mention/Talk of parting
परिंदों= Birds
तक़दीर= Fate, Destiny.






शनिवार, 12 मई 2018

!!! लकीरें !!!

फूलों से दिल लगाया, दिल चाक कर गए !
काँटों से दिल लगाया तो ज़ख़्म भर गए !

गर्दन को ख़ंजर पे तू रखता है तो सुन ले,
इस आशिक़ी में जाने कितनों के सर गए !

ख़ंजर से लकीरों को बदलने चले थे हम,
नादान हथेलियों में कई ज़ख़्म भर गए !

फ़िर अपनी ज़िन्दगी को मुड़कर जो मैंने देखा,
इस ज़िन्दगी से बहुत तेज़ हम गुज़र गए !

जो लोग ज़िन्दगी की गर्दिश से डर गए,
जीते जी वो लोग ज़िंदा ही मर गए !

इस ज़िन्दगी ने यूँ तो, सबको ही आज़माया,
कुछ लोग बिखर गए तो कुछ लोग निखर गए !

लौटा नहीं जो शाम को, मैं हूँ वो परिंदा,
वो लोग ख़ुश-नसीब थे जो अपने घर गए !

क्यूँ हमको ये ज़माना, कहने लगा है अच्छा,
'फ़राज़देखिये तो सही क्या हम भी मर गए !

||| फ़राज़ |||

चाक= Slit, 
ज़ख़्म= Wound
गर्दन= The neck
ख़ंजर= A Dagger, A poniard
नादान= Innocent, Foolish
गर्दिश= Circulation, Revolution, Misfortune
परिंदा= Bird
ख़ुशनसीब= Lucky, Fortunate.

मंगलवार, 13 मार्च 2018

कौन ???

बे-वजह किसीके लिए अब मुस्कुराता कौन है ?
भटके हुए को रास्ता अब दिखलाता कौन है ?

इंसान तो अब इंसान के भी काम नहीं आता,
परिंदों को आजकल पानी पिलाता कौन है ?

इंसानियत को हिस्से में बांटने वाली,
ज़मीन पर ये लकीरें बिछाता कौन है ?

सरहद के पार सब दुश्मन ही रहते हैं,
अफ़वाह दोनों ही तरफ ये फैलाता कौन है ?

लोग तो एक पल में रिश्ते भुला देते हैं,
रंजिशें कभी मगर भूल पाता कौन है ?

जिस ख़ुदा को तेरा क़ानून मानता ही नहीं,
उसकी कसम मेरे क़ातिल को खिलाता कौन है ?

मेरा आक़ीदा है तो इबादत करता हूँ,
नज़र से ख़ुदा को देख पाता कौन है ?

दाढ़ी पहचान हो गई दहशतगर्दी की,
इस्लाम की ये तस्वीर बनाता कौन है ?

सुना है 'फ़राज़' कि अच्छे दिन आयेंगे,
इस बार ये लतीफ़ा सुनाता कौन है ?

|||
फ़राज़ |||

बे-वजह= Without cause, 
परिंदे= Birds
इंसानियत= Humanity
लकीर= Line, Streak
सरहद= Border, Boundary
अफ़वाह= Rumor
रंजिश= Enmity, ill-will/ hostility
क़ातिल= Murderer
आक़ीदा= Faith, Fundamental Doctrine of Belief, Tenet
इबादत= Prayers, Adoration
दाढ़ी= Beard
दहशतगर्दी= Terrorism,
इस्लाम= The religion of the Muslims
लतीफ़ा= Joke

रविवार, 7 जनवरी 2018

बुत-शिकन !!!

वो परिंदे शाख़ों पे फ़िर नहीं लौटे,
दूर शहरों में जिनके घर हो गए !

अब किसी और पे तंज़ करते होंगे शहरवाले,
तो क्या हुआ जो हम शहर-बदर हो गए !

अपनी हस्ती पे गुमां वो करता क्यूँ है ?
क्या उसके सजदे में भी सर हो गए ?

तेरी मुट्ठी से भी फिसलेगी ये दुनिया एक दिन,
ख़ाली हाथ ही वो भी गए, जो सिकंदर हो गए !

नज़र तराशती रही ख़ुदा को ज़ाहिर में,
बुत-शिकन वो हुए, जो बेनज़र हो गए !

कोई शिकस्त रायग़ाँ न हमने जाने दी,
हम जब भी हारे तो और बेहतर हो गए !

सूबे में घुटी-घुटी सी ख़ामोशी क्यूँ है,
लगता है फ़सादी सूबे के सदर हो गए !

तो अब कौन सी शरिअ'त तामील की जाए,
'फ़राज़' अब तो बुर्क़े भी डिज़ाइनर हो गए !

|||फ़राज़|||

परिंदा= Bird
शाख़= Branch
तंज़= Sarcasm, Satire, Mocking, Sneer.
ताने= Blame, Reproach, Taunt.
शहर-बदर= Exile, Banishment.
हस्ती= Existence, Position.
गुमां= Doubt, Proud.
सजदा= Bowing to prayer so as to touch the ground with the forehead.
ज़ाहिर= Visible, outside, evident, open.
बुत-शिकन= Iconoclast, Idol-Breaker
बुत= Idols. A metaphor frequently used for beloved/women in Urdu poetry
बेनज़र= without eyes, 
शिकस्त= Defeat, Failure, Rout.
रायग़ाँ= Useless, Fruitless, In vain.
फ़सादी= Roitor, Dissenter
सूबा= Province, State.
सदर= President, Chief.
शरिअ'त= Islamic code of conduct.
तामील= Compliance, Submission, Execute.
बुर्क़ा= A kind of mantle or veil covering the whole body from head to toe.


गुरुवार, 9 नवंबर 2017

हसरतें !!!

कैसी अकड़ तुझको तेरे जिस्म-ए-फ़ानी पर,
अकड़ तो लाश जाती है, तू अकड़ता क्यूँ है !

ख़ुदा से भी डरता नहीं ये दिल तेरा,
तो मौत से दिल भला डरता क्यूँ है !

ख़ुद को बताता है तू अह्ल-ए-सुन्नत,
पंख परिंदों के भला तू कतरता क्यूँ है !

तुझको मालूम है न आयगा वो अयादत करने,
आह भरता है तू तो आह तू भरता क्यूँ है !

कहते हैं कि प्यार है ताउम्र का नशा
है अगर ये नशा तो फ़िर उतरता क्यूँ है !

सबको तो मालूम है पता तेरे नए घर का
डाकिया अब भी मेरी गली से गुज़रता क्यूँ है !

तेरे दामन से लिपटे हैं मेरे लम्हें अब भी
वक़्त मुट्ठी से रेत सा फिसलता क्यूँ है !

तू तो कहता की अब तुझे फर्क़ नहीं पड़ता
देख कर मुझको अब तू संभालता क्यूँ है !

मेरे तसव्वुर में झाँक कर देखो तो जानोगे
दिल मेरा उसको पाने को मचलता क्यूँ है !

लौट आएगा फ़िर से तेरा गुज़रा हुआ कल,
जागती आँखों में ये ख़्वाब टहलता क्यूँ है !

ऐ फ़राज़ तू अब बच्चा तो नहीं है,
हसरतें चाँद को छूने की करता क्यूँ है !

|||फ़राज़|||

जिस्म-ए-फ़ानी= Mortal Body.
परिंदा= Birds
अयादत= visiting, inquiring (after ailing person)
ताउम्र= Life long
दामन= Hem,
फ़र्क= Difference.
तसव्वुर= Imagination, Contemplation.
अह्ल-ए-सुन्नत= When Islam was being broken into sects on small differences, a majority of the believers who stayed close to the guidance and teachings of the Messenger of Allah (saws), came to be recognized as the Ahle-Sunnah wal Jamaa. Their main principle was to stay close to the teachings of the Quran and Sunnah, and stay within the Jamaa or Ummah of Muslims without joining any of the breakaway sects. Thus their name: Ahle-Sunnah wal Jamaa (those who follow the Sunnah and stay with the Jamaa or community).