khushnaseeb लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
khushnaseeb लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 12 मई 2018

!!! लकीरें !!!

फूलों से दिल लगाया, दिल चाक कर गए !
काँटों से दिल लगाया तो ज़ख़्म भर गए !

गर्दन को ख़ंजर पे तू रखता है तो सुन ले,
इस आशिक़ी में जाने कितनों के सर गए !

ख़ंजर से लकीरों को बदलने चले थे हम,
नादान हथेलियों में कई ज़ख़्म भर गए !

फ़िर अपनी ज़िन्दगी को मुड़कर जो मैंने देखा,
इस ज़िन्दगी से बहुत तेज़ हम गुज़र गए !

जो लोग ज़िन्दगी की गर्दिश से डर गए,
जीते जी वो लोग ज़िंदा ही मर गए !

इस ज़िन्दगी ने यूँ तो, सबको ही आज़माया,
कुछ लोग बिखर गए तो कुछ लोग निखर गए !

लौटा नहीं जो शाम को, मैं हूँ वो परिंदा,
वो लोग ख़ुश-नसीब थे जो अपने घर गए !

क्यूँ हमको ये ज़माना, कहने लगा है अच्छा,
'फ़राज़देखिये तो सही क्या हम भी मर गए !

||| फ़राज़ |||

चाक= Slit, 
ज़ख़्म= Wound
गर्दन= The neck
ख़ंजर= A Dagger, A poniard
नादान= Innocent, Foolish
गर्दिश= Circulation, Revolution, Misfortune
परिंदा= Bird
ख़ुशनसीब= Lucky, Fortunate.

सोमवार, 28 अगस्त 2017

ग़ज़ल-ए-फ़राज़!!!

मुब्तिला क्यूँ रहता हैं मन मुनाफ़ाखोरी में,
ख़ुदग़र्ज़ियाँ छुपी रहती हैं मन की दराज़ में !

मुद्दतों तलक ख़लाओं में भटकता रहा हूँ,
ख़ुद को पाया है मैंने अपने ही अल्फ़ाज़ में !

ज़ुल्म देखकर भी खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं,
रवादारी नहीं बाक़ी इस शहर के मिजाज़ में !

एक ही माटी के पुतले तो सभी इंसान हैं,
थोड़े सच्चे, थोड़े झूठे, अपने ही अंदाज़ में !

वो बेख़बर शोर कहता है सदा-ए-रूहानी को,
क्या ख़ुदा बसता नहीं मौसिक़ी-ओ-साज़ में !

तू परिंदा है ग़ाफ़िल, शाम को लौटना होगा,
मत भूल ज़मीं तू अपनी ऊंची परवाज़ में !

बहुत ख़ुशनसीब हूँ कि हुनरमंद हूँ मैं,
दोस्त मिलते हैं मुझे हर दिलनवाज़ में !

तुझको भी ज़िन्दगी से कुछ तो गिला है,
ख़ुद को ढूंढता है तू ग़ज़ल-ए-फ़राज़ में !

|||फ़राज़|||

मुब्तिला= Afflicted.
मुनाफ़ाखोरी=Profiteer
ख़ुदग़र्ज़ी= selfishness.
दराज़= Drawer
ख़ला=Space, Hollow.
रवादारी=Leniency
मिजाज़=Nature
सदा-ए-रूहानी= Spiritual/God's Call
मौसिक़ी-ओ-साज़=Music and Instrument.
ग़ाफ़िल= Neglectful
परवाज़= Flight.
दिलनवाज़= Kind, Benevolent.