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सोमवार, 28 अगस्त 2017

ग़ज़ल-ए-फ़राज़!!!

मुब्तिला क्यूँ रहता हैं मन मुनाफ़ाखोरी में,
ख़ुदग़र्ज़ियाँ छुपी रहती हैं मन की दराज़ में !

मुद्दतों तलक ख़लाओं में भटकता रहा हूँ,
ख़ुद को पाया है मैंने अपने ही अल्फ़ाज़ में !

ज़ुल्म देखकर भी खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं,
रवादारी नहीं बाक़ी इस शहर के मिजाज़ में !

एक ही माटी के पुतले तो सभी इंसान हैं,
थोड़े सच्चे, थोड़े झूठे, अपने ही अंदाज़ में !

वो बेख़बर शोर कहता है सदा-ए-रूहानी को,
क्या ख़ुदा बसता नहीं मौसिक़ी-ओ-साज़ में !

तू परिंदा है ग़ाफ़िल, शाम को लौटना होगा,
मत भूल ज़मीं तू अपनी ऊंची परवाज़ में !

बहुत ख़ुशनसीब हूँ कि हुनरमंद हूँ मैं,
दोस्त मिलते हैं मुझे हर दिलनवाज़ में !

तुझको भी ज़िन्दगी से कुछ तो गिला है,
ख़ुद को ढूंढता है तू ग़ज़ल-ए-फ़राज़ में !

|||फ़राज़|||

मुब्तिला= Afflicted.
मुनाफ़ाखोरी=Profiteer
ख़ुदग़र्ज़ी= selfishness.
दराज़= Drawer
ख़ला=Space, Hollow.
रवादारी=Leniency
मिजाज़=Nature
सदा-ए-रूहानी= Spiritual/God's Call
मौसिक़ी-ओ-साज़=Music and Instrument.
ग़ाफ़िल= Neglectful
परवाज़= Flight.
दिलनवाज़= Kind, Benevolent.