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शनिवार, 3 अगस्त 2019

क्यूँ है

एक ख़ौफ़ का ये मंज़र क्यूँ है,
अपने ही घर में डर क्यूँ है !

झगड़ा तो है इंसानों का,
रुसवा मस्जिद-मंदिर क्यूँ है !

जिन हाथों में मुस्तक़बिल था,
उन हाथों में पत्थर क्यूँ है !

जो बात ज़रूरी है कहनी,
वो ही दिल के अंदर क्यूँ है !

तुमको भी इश्क़ हुआ था न,
इल्ज़ाम सिरफ़ मुझ पर क्यूँ है !

कहते हैं इसको बड़ा शहर,
तो इतने छोटे घर क्यूँ हैं !

कुछ करना है तो कर डालो,
इतनी भी अगर मगर क्यूँ है !

अल्फ़ाज़’ के दुश्मन ज़ाहिर थे,
तो पीठ में ये ख़ंजर क्यूँ है !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़ौफ़ = Fear, Dread, Terror, भय
मंज़र = Scene, View, दृश्य
रुसवा = Dishonored, Despondent, अपमानितहताश
मुस्तक़बिल = Future, भविष्य
इल्ज़ाम = Allegation, Blame, आरोप
सिरफ़ = Only, मात्र
ज़ाहिर = Evident, Open, प्रत्यक्ष

रविवार, 6 मई 2018

!!! अल्फ़ाज़ !!!

तो क्या हुआ जो ये जहाँ नाराज़ हो गया,
मैं ख़ुद से राज़ी हुआ तो 'अल्फ़ाज़' हो गया !

एक राज़ कहते-कहते मैं रुक जाता था अक्सर,
लेकिन ग़ज़ल में ज़ाहिर हर राज़ हो गया !

तू बन गया था मेरे अंजाम का सबब,
जब तू गया तो मेरा आग़ाज़ हो गया !

पंखों की बंदिशें और पैरों की बेड़ियाँ,
सब तोड़ मेरा हौसला परवाज़ हो गया !

बदल हम दोनों गए बस फ़र्क़ है इतना,
तू ख़ुदगर्ज़ हो गया, मैं बेनियाज़ हो गया !

मेरी वजह से तुझसे दुनिया को हैं गिले,
ग़म-ए-हयात मेरा कारसाज़ हो गया !

एक पल में छोड़ जाती है रूह जिस्म को,
 बुलबुले, क्यूँ ख़ुद पे तुझे नाज़ हो गया !

इज़्ज़त, दुआ, सुकून, और मेयार, सब मिला,
क़िस्मत से मुझे हासिल नाम-ए-फ़राज़ हो गया !

||| फ़राज़ |||


नाराज़= Displeased, Offended
राज़ी= Satisfied, Agreed, Pleased
राज़= Secret
ज़ाहिर= Open, Evident
अंजाम= Fate, End, Result
सबब= Cause, Reason, Ground
आग़ाज़= Beginning, Commencement.
बंदिशें= Restrictions
बेड़ियाँ= Chains, Shackles.
हौसला= Courage, Morale, 
परवाज़= Flight
फ़र्क़= Difference.
ख़ुदगर्ज़= Selfish, Self-Interested.
बेनियाज़= Carefree, Without Want, Independent.
गिले= Complaints, Lamentations.
ग़म-ए-हयात= Sorrows Of Life
कारसाज़= Benefactor, Guardian, Doer.
रूह= Soul, Spirit
जिस्म= Bode, Substance.
बुलबुले= Bubble
नाज़= Pride
मेयार= Standard
हासिल= Gain
नाम-ए-फ़राज़= Name Of Faraaz (In Respect Of The Great Urdu Poet Ahmed Faraz Sir)

मंगलवार, 27 मार्च 2018

!!! तलब !!!

आज संभालता नहीं मुझसे राज़ तेरा,
आज लब-कुशाई की तलब रखता हूँ !

आज फ़िर आया हूँ तेरी महफ़िल में,
आज फ़िर जग-हँसाई की तलब करता हूँ !

क्या करूं कि तुझ सा बे-हया तो नहीं,
यूँ तो बेवफ़ाई की तलब रखता हूँ !

काश कोई माटी की गुल्लक साबुत होती,
सिक्कों की शहंशाही की तलब रखता हूँ !

मुझे भी कड़वी तो नहीं लगती झूठी तारीफ़,
फ़िर भी तुझसे सच्चाई की तलब रखता हूँ !

जिसकी हिफ़ाज़त में इन्सान लगे रहते हैं,
उस ख़ुदा से मसीहाई की तलब रखता हूँ !

मैं ख़याल हूँ 'अल्फ़ाज़' मुझे ज़ाहिर कर दे,
आज अपनी मुँह-दिखाई की तलब रखता हूँ !

||| अल्फ़ाज़ |||


लब-कुशाई= Lip-Opening.
तलब= Demand, Desire
महफ़िल= Party, Gathering
जग-हँसाई= Ridicule Of The World
बे-हया= Shameless, Immodest
बेवफ़ाई= Faithlessness, Treachery
गुल्लक= Piggybank
साबुत= Unbroken
सिक्कों= Coins
शहंशाही= Kingship, Royalty, Imperialism
तारीफ़= Praise, Admiration,
हिफ़ाज़त= Guarding, Protection, Security
मसीहाई= Messianism (In Abrahamic Religions, Messianism Is The Belief And Doctrine That Is Centered On The Advent Of The Messiah, Who Acts As The Chosen Savior And Leader Of Humanity By God.)
ख़याल= Thought
ज़ाहिर= Apparent, Evident, Open
मुँह-दिखाई= Unveil The Face/Secret.

बुधवार, 10 जनवरी 2018

तीर-ए-नज़र !!!

उसके तरकश में बाक़ी है कई ज़ुल्म-ओ-सितम,
फ़िलहाल तो ये वार तीर-ए-नज़र के देखिये !

जान भी मांगेगा एक दिन ये दिल लेने वाला,
सब्र कीजिये और फ़िर ईनआ' सब्र के देखिये !

चाँद भी रंजिशें रखता है जिसकी सबाहत से,
एक रात उसके शहर में भी ठहर के देखिये !

मैं हर सुबह क्यूँ मुस्कुराता हुआ जागता हूँ,
कभी ख़ुद को मेरे ख़्वाबों में आ कर के देखिये !

सुना है रात भर जागते हैं इश्क़ करने वाले,
नींद से रब्त न हो तो इश्क़ कर के देखिये !

सुना है की वो कुछ भी संभाल कर नहीं रखता,
ज़रा उनसे दिल तो अपना मांग कर के देखिये !

हाल-ए-दिल उनका भी पता चल ही जाएगा,
हाल-ए-दिल अपना ज़ाहिर तो करके देखिये !

इजाज़त हो तो 'फ़राज़' आपको ग़ज़ल कर दे
और फ़िर अश'आर अपने शायर के देखिये !

|||
फ़राज़ |||

तरकश= Quiver.
ज़ुल्म-ओ-सितम= Tyranny, Oppression.
फ़िलहाल= As of now, At present.
तीर-ए-नज़र= Arrow of glances.
सब्र= Patience, Endurance.
ईनआ'म= Prize, Reward
रंजिश= Ill-will, Hostility.
सबाहत= Beauty, Gracefulness, Comeliness.
रब्त= Intimacy, Bond, Connection.
हाल-ए-दिल= Condition of heart.
ज़ाहिर= Open, Reveal.
इजाज़त= Permission.
अश'आर= Couplets.

रविवार, 7 जनवरी 2018

बुत-शिकन !!!

वो परिंदे शाख़ों पे फ़िर नहीं लौटे,
दूर शहरों में जिनके घर हो गए !

अब किसी और पे तंज़ करते होंगे शहरवाले,
तो क्या हुआ जो हम शहर-बदर हो गए !

अपनी हस्ती पे गुमां वो करता क्यूँ है ?
क्या उसके सजदे में भी सर हो गए ?

तेरी मुट्ठी से भी फिसलेगी ये दुनिया एक दिन,
ख़ाली हाथ ही वो भी गए, जो सिकंदर हो गए !

नज़र तराशती रही ख़ुदा को ज़ाहिर में,
बुत-शिकन वो हुए, जो बेनज़र हो गए !

कोई शिकस्त रायग़ाँ न हमने जाने दी,
हम जब भी हारे तो और बेहतर हो गए !

सूबे में घुटी-घुटी सी ख़ामोशी क्यूँ है,
लगता है फ़सादी सूबे के सदर हो गए !

तो अब कौन सी शरिअ'त तामील की जाए,
'फ़राज़' अब तो बुर्क़े भी डिज़ाइनर हो गए !

|||फ़राज़|||

परिंदा= Bird
शाख़= Branch
तंज़= Sarcasm, Satire, Mocking, Sneer.
ताने= Blame, Reproach, Taunt.
शहर-बदर= Exile, Banishment.
हस्ती= Existence, Position.
गुमां= Doubt, Proud.
सजदा= Bowing to prayer so as to touch the ground with the forehead.
ज़ाहिर= Visible, outside, evident, open.
बुत-शिकन= Iconoclast, Idol-Breaker
बुत= Idols. A metaphor frequently used for beloved/women in Urdu poetry
बेनज़र= without eyes, 
शिकस्त= Defeat, Failure, Rout.
रायग़ाँ= Useless, Fruitless, In vain.
फ़सादी= Roitor, Dissenter
सूबा= Province, State.
सदर= President, Chief.
शरिअ'त= Islamic code of conduct.
तामील= Compliance, Submission, Execute.
बुर्क़ा= A kind of mantle or veil covering the whole body from head to toe.