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बुधवार, 10 जनवरी 2018

तीर-ए-नज़र !!!

उसके तरकश में बाक़ी है कई ज़ुल्म-ओ-सितम,
फ़िलहाल तो ये वार तीर-ए-नज़र के देखिये !

जान भी मांगेगा एक दिन ये दिल लेने वाला,
सब्र कीजिये और फ़िर ईनआ' सब्र के देखिये !

चाँद भी रंजिशें रखता है जिसकी सबाहत से,
एक रात उसके शहर में भी ठहर के देखिये !

मैं हर सुबह क्यूँ मुस्कुराता हुआ जागता हूँ,
कभी ख़ुद को मेरे ख़्वाबों में आ कर के देखिये !

सुना है रात भर जागते हैं इश्क़ करने वाले,
नींद से रब्त न हो तो इश्क़ कर के देखिये !

सुना है की वो कुछ भी संभाल कर नहीं रखता,
ज़रा उनसे दिल तो अपना मांग कर के देखिये !

हाल-ए-दिल उनका भी पता चल ही जाएगा,
हाल-ए-दिल अपना ज़ाहिर तो करके देखिये !

इजाज़त हो तो 'फ़राज़' आपको ग़ज़ल कर दे
और फ़िर अश'आर अपने शायर के देखिये !

|||
फ़राज़ |||

तरकश= Quiver.
ज़ुल्म-ओ-सितम= Tyranny, Oppression.
फ़िलहाल= As of now, At present.
तीर-ए-नज़र= Arrow of glances.
सब्र= Patience, Endurance.
ईनआ'म= Prize, Reward
रंजिश= Ill-will, Hostility.
सबाहत= Beauty, Gracefulness, Comeliness.
रब्त= Intimacy, Bond, Connection.
हाल-ए-दिल= Condition of heart.
ज़ाहिर= Open, Reveal.
इजाज़त= Permission.
अश'आर= Couplets.

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

ज़ेर-ओ-ज़बर !!!

बेताब है गर दिल लुटने को,
तो तीर-ए-नज़र को क्या कहिये !

है जान का दुश्मन बन बैठा,
उस जान-ए-जिगर को क्या कहिये !

मज़हब सा तुझे है मान लिया,
अब कोर-कसर को क्या कहिये !

बस तेरी ही ग़ज़ल मैं लिखता हूँ,
अब ज़ेर-ओ-ज़बर को क्या कहिये !

हैं जिसकी शिकायत करते जुगनू,
उस रश्क़-ए-क़मर को क्या कहिये !

इल्ज़ाम न दे तू बस दिल को,
मिल जाए नज़र तो क्या कहिये !

क्या कहिये मिलन की चाहत को,
फ़िराक़ के डर को क्या कहिये !

शम्मा-ए-महफ़िल से आशना है 'फ़राज़',
एक पतंगे के जिगर को क्या कहिये !

|||फ़राज़|||

बेताब= Desperate, Impatient Restless.
गर= If
तीर-ए-नज़र= Arrow of the eye.
जान-ए-जिगर= Life of the heart.
कोर-कसर= Imperfection, Shortening, Deficiency.
ज़ेर-ओ-ज़बर= Topsy-turvy, Upside down.
रश्क़-ए-क़मर= Envy of moon.
इल्ज़ाम= Blame, Accusation.
फ़िराक़= Separation, Absence Departing.
शम्मा-ए-महफ़िल= Candle of the party/ Assembly.
आशना= Intimate, Acquaint.
पतंगा= Moth
जिगर= Heart.


सोमवार, 10 जुलाई 2017

इश्क़ !!!

क्या ख़ूब कह गया था
वो कहने वाला,
इश्क़ है आग का दरिया
फ़िर भी उतर के देख !

इस आग में जल के ही
तुझे मुनव्वर होना है,
गर यही बाक़ी है रास्ता
तो फ़िर गुज़र के देख !

कुछ अंगड़ाइयों को
तेरा भी इंतज़ार है,
दिल पर ले के वार
तू तीर-ए-नज़र के देख !

तेरी नज़रों को मियां
सारा ज़माना पढ़ता है,
तू ईद का चाँद भी
न उसकी मुंडेर पर से देख !

लोग तो लोग हैं
कानों में बातें करते हैं,
दीदार-ए-यार हो जाये
तो तू जी भर के देख !

न रहेंगी सदा जवानियाँ
कुछ ग़लतियाँ तो कर ले,
सबकी नज़रों से बच के
उसकी गली से गुज़र के देख !

तू छोड़ दे फ़िक्रें
सवाब और अज़ाबों की,
हसीन सा गुनाह है इश्क़
फ़िर भी कर के देख !

 ||| फ़राज़ |||

मुनव्वर= Illuminated, Enlightened
सवाब= Reward of good deeds
अज़ाब= Torment, Agony