उसके तरकश में बाक़ी है कई ज़ुल्म-ओ-सितम,
फ़िलहाल तो ये वार तीर-ए-नज़र के देखिये !
जान भी मांगेगा एक दिन ये दिल लेने वाला,
सब्र कीजिये और
फ़िर ईनआ'म सब्र के देखिये !
चाँद भी रंजिशें रखता है जिसकी सबाहत से,
एक
रात उसके शहर में भी ठहर के देखिये !
मैं हर सुबह क्यूँ मुस्कुराता हुआ जागता हूँ,
कभी
ख़ुद को मेरे ख़्वाबों में आ कर के देखिये !
सुना है रात भर जागते हैं इश्क़ करने वाले,
नींद
से रब्त न हो तो इश्क़
कर के देखिये !
सुना है की वो कुछ भी संभाल कर नहीं रखता,
ज़रा
उनसे दिल तो अपना मांग कर के देखिये !
हाल-ए-दिल उनका भी पता चल ही जाएगा,
हाल-ए-दिल अपना ज़ाहिर तो करके
देखिये !
इजाज़त हो तो 'फ़राज़' आपको ग़ज़ल कर दे
और
फ़िर अश'आर अपने शायर के
देखिये !
||| फ़राज़ |||
तरकश= Quiver.
ज़ुल्म-ओ-सितम= Tyranny,
Oppression.
फ़िलहाल=
As of now, At present.
तीर-ए-नज़र=
Arrow of glances.
सब्र= Patience, Endurance.
ईनआ'म= Prize, Reward
रंजिश=
Ill-will, Hostility.
सबाहत=
Beauty, Gracefulness,
Comeliness.
रब्त= Intimacy, Bond,
Connection.
हाल-ए-दिल=
Condition of heart.
ज़ाहिर=
Open, Reveal.
इजाज़त=
Permission.
अश'आर= Couplets.