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मंगलवार, 31 जुलाई 2018

ख़ुश-ख़बर !

नया मौसम हो जातू ख़ुश-ख़बर हो जा,
बारिश की तरह फ़सलों को मयस्सर हो जा !

जलना है तो यूँ जल कि उजाला हो,
हर एक अँधेरे में तू मुनव्वर हो जा !

तेरी ख़बर भी पूछेंगे ये ख़बरवाले,
बस एक बार तू ख़ुद से बा-ख़बर हो जा !

कोई नक़्श-ए-क़दम जहाँ तक पहुँचे न हों,
ऐसी मंज़िल का तू रहबर हो जा !

मेरी क़ौम फ़िर से सर-बुलंद हो जायेगी,
 मुसलमां तू फ़िर से मोतबर हो जा !

ये दुनिया इतनी बुरी भी तो नहीं है
ख़ुशी ढूँढनी है तो तू ख़ुश-नज़र हो जा !

सुकूँ बिकता नही है 'फ़राज़बाज़ारों में,
मस्त रहना है तो तू क़लन्दर हो जा !

||| फ़राज़ |||

ख़ुश-ख़बर= Good News
फ़सल= Crops
मयस्सर= Available
मुनव्वर= Illuminated, 
ख़बर= News
ख़बर-वाले= News Media
बा-ख़बर= Aware, Informed
नक़्श-ए-क़दम= Footsteps, Footprints
रहबर= Guide
क़ौम= Tribe, Race, Community
सर-बुलंद= Eminent, Glorious.
मुसलमां= The Muslim
मोतबर= Trust-Worthy, Reliable
ख़ुश-नज़र= Positive-Sighted
सुकूँ= Peace
क़लन्दर= Ascetic, One Who Has Abandoned Wealth And Worldly Pleasures


रविवार, 15 अक्टूबर 2017

मैं !!!

तुझको अक्सर मैं छू के गुजरूँगा,
झौंका मैं इसी शहर की हवा का हूँ !

मेरा बचपन तेरे आँगन में भी तो खेला है,
बच्चा तो मैं पड़ोस के ही मकां का हूँ !

मुझको बहला न पाओगे तुम चराग़ों से,
मैं तलबगार तो सिर्फ़ कहकशां का हूँ !

अरे ओ मेरी रौशनी से जलने वालों,
अभी सितारा तो बस मैं सुबह का हूँ !

जानवर खाने का शौक़ मैं भी रखता हूँ,
मुसलमान मैं भी कहाँ ख़्वाह-मख़ाह का हूँ !

अज़ान के वक़्त तुम भी ज़रा ख़ामोश रहो,
यूँ तो पाबंद मैं भी गुनाह का हूँ !

मुझको हिंदी में मज़हब तुम सिखलाओ,
मैं आलिम कहाँ अरबी ज़बां का हूँ !

क्यूँ न हो ग़ुरूर मुझे अपनी हस्ती पर,
ज़र्रा तो मैं भी उसी ख़ुदा का हूँ !

ख़ुद की आग में जलके मैं मुनव्वर हूँ,
मैं कहाँ परवाना किसी शमा का हूँ !

मेरी रगों में भी बहता है गंगा का पानी
मैं मुसलमान हूँमगर हिन्दोस्तां का हूँ !!!

|||फ़राज़|||
मकां= House, Home.
चराग़= An Oil Lamp.
तलबगार= Seeker, Claimant, Desirous.
कहकशां= The Galaxy, The Milky Way.
शौक़= Fondness, Desire, Ardor
ख़्वाह-मख़ाह= Simply, For No Reason, Just Like That.
अज़ान= The Islamic Call To Prayer
पाबंद= Punctual.
मज़हब= Religion.
आलिम= Scholar, Learned, Intelligent.
अरबी= Arabic
ज़बां= Tongue, Speech.
ग़ुरूर= Proud.
ज़र्रा= An Atom, A Particle.
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened.
परवाना= Moth.

शमा= Candle.

सोमवार, 24 जुलाई 2017

जूनून !!!

तेरा हर ख़्वाब हो जायेगा हक़ीकत
जूनून पर अपने तू यकीन कर ले !

अपनी ज़िद के पंख फैलाकर तो देख
परवाज़ से आसमान को ज़मीं कर ले !

बनके सूरज तू सारा जहाँ मुनव्वर कर
बनके चाँद अमावास को चांदनी कर दे !

उससे हारेगा तो सब जीत जायेगा तू
किसी रूठे यार से फ़िर दोस्ती कर ले !

माँ कहती हैं कि ख़ुदा सुनता है दुआओं को
माँ की भी सुन ले, ख़ुदा की भी बंदगी कर ले !

तुझसा भी कोई हिस्सास तो होगा ज़माने में 
कोई हमख़याल मिल जाये तो हमनशीं कर ले !

ज़माने की हमा-हामी ख़त्म न होगी ता-क़यामत
जहाँ दिल लग जाए तेरा, क़याम वहीँ कर ले !

तेरा नाम भी लिख जायेगा तारीख़ों में ''फ़राज़
अपनी सोहबत से तू आदमी को आदमी कर दे !

||| फ़राज़ |||

परवाज़= Flight, Rising. 
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened,
बंदगी= Worship, Devotion
हिस्सास= Sensitive. 
हमनशीं= Companion, Associate.
हमा-हामी= Bragging, Boasting, Tall talk.
ता-क़यामत= Up to dooms day.
क़याम= Stay.
तारीख़= Date, History.


सोमवार, 10 जुलाई 2017

इश्क़ !!!

क्या ख़ूब कह गया था
वो कहने वाला,
इश्क़ है आग का दरिया
फ़िर भी उतर के देख !

इस आग में जल के ही
तुझे मुनव्वर होना है,
गर यही बाक़ी है रास्ता
तो फ़िर गुज़र के देख !

कुछ अंगड़ाइयों को
तेरा भी इंतज़ार है,
दिल पर ले के वार
तू तीर-ए-नज़र के देख !

तेरी नज़रों को मियां
सारा ज़माना पढ़ता है,
तू ईद का चाँद भी
न उसकी मुंडेर पर से देख !

लोग तो लोग हैं
कानों में बातें करते हैं,
दीदार-ए-यार हो जाये
तो तू जी भर के देख !

न रहेंगी सदा जवानियाँ
कुछ ग़लतियाँ तो कर ले,
सबकी नज़रों से बच के
उसकी गली से गुज़र के देख !

तू छोड़ दे फ़िक्रें
सवाब और अज़ाबों की,
हसीन सा गुनाह है इश्क़
फ़िर भी कर के देख !

 ||| फ़राज़ |||

मुनव्वर= Illuminated, Enlightened
सवाब= Reward of good deeds
अज़ाब= Torment, Agony

बुधवार, 10 मई 2017

दिल-ए-मुफ़्लिस !!!


क्यूँ न दर्द को ही अब हमसफ़र कर लें
एक दर्द ही तो है जो छोड़ कर जाता नहीं !

तेरी पर्देदारियों का एहतराम रखता है
इल्ज़ाम दिल तुझपर कभी लगाता नहीं !

रखता है मुनव्वर सदा तेरी यादों से
शमा-ए-उम्मीद दिल कभी बुझाता नहीं !

एक हम कि हर बार ही तेरी ज़िद करते हैं
एक तू कि ग़लतियां कभी दोहराता नहीं !

यूँ तो नज़रों से है फ़ासला अब सदियों का
ख़ुदाया दिल से आखिर वो क्यूँ जाता नहीं !

क्या ख़बर थी की वो करता है दिल्लगी
वादे हज़ार करता है मगर निभाता नहीं !

तेरी राहों के हवाले ही अब कर दूँ  ज़िन्दगी
बराह-ए-रास्त दूजा अब और नज़र आता नहीं !

दिल-ए-मुफ़्लिस तू अब न रूठा कर
मुद्दतें गुजरीं कि अब वो मनाता नहीं !

||| फ़राज़ |||

पर्देदारियां= Secrecies.
इल्ज़ाम= Blame
मुनव्वर= Illuminated.
शमा-ए-उम्मीद= Candle of hope.
ज़िद= Insistence.
सदियां= Ages, Centuries.
ख़ुदाया= God.
दिल्लगी= Amusement, Merriment.
बराह-ए-रास्त= Directing, Guiding.
दिल-ए-मुफ़्लिस= Poor Heart. 
मुद्दत= A long time/period