बुधवार, 10 मई 2017

दिल-ए-मुफ़्लिस !!!


क्यूँ न दर्द को ही अब हमसफ़र कर लें
एक दर्द ही तो है जो छोड़ कर जाता नहीं !

तेरी पर्देदारियों का एहतराम रखता है
इल्ज़ाम दिल तुझपर कभी लगाता नहीं !

रखता है मुनव्वर सदा तेरी यादों से
शमा-ए-उम्मीद दिल कभी बुझाता नहीं !

एक हम कि हर बार ही तेरी ज़िद करते हैं
एक तू कि ग़लतियां कभी दोहराता नहीं !

यूँ तो नज़रों से है फ़ासला अब सदियों का
ख़ुदाया दिल से आखिर वो क्यूँ जाता नहीं !

क्या ख़बर थी की वो करता है दिल्लगी
वादे हज़ार करता है मगर निभाता नहीं !

तेरी राहों के हवाले ही अब कर दूँ  ज़िन्दगी
बराह-ए-रास्त दूजा अब और नज़र आता नहीं !

दिल-ए-मुफ़्लिस तू अब न रूठा कर
मुद्दतें गुजरीं कि अब वो मनाता नहीं !

||| फ़राज़ |||

पर्देदारियां= Secrecies.
इल्ज़ाम= Blame
मुनव्वर= Illuminated.
शमा-ए-उम्मीद= Candle of hope.
ज़िद= Insistence.
सदियां= Ages, Centuries.
ख़ुदाया= God.
दिल्लगी= Amusement, Merriment.
बराह-ए-रास्त= Directing, Guiding.
दिल-ए-मुफ़्लिस= Poor Heart. 
मुद्दत= A long time/period



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