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गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

!!! तजरबा !!!

शायद मेरी वफ़ा का सिला दे गया मुझे,
रातों को जागने की सज़ा दे गया मुझे !

ज़िन्दगी जिसके बिना बद-दुआ सी लगती है,
जाते-जाते वो जीने की दुआ दे गया मुझे !

आज फ़िर मैंने तुझसे तेरे वादों की बात की,
आज फ़िर भूलने का तू मशवरा दे गया मुझे !

कैसे भूलूँ मैं तुझे ओ मुझको भूलने वाले,
उम्र-ए-दराज़ का तू गिला दे गया मुझे !

अच्छा ही हुआ कि अब तू मिलता नहीं मुझसे,
फ़ासला हर बार तू नया दे गया मुझे !

ये दुश्मन-ए-जां कभी मेरी जान भी हुआ करता था,
वक़्त भी ये क्या मरहला दे गया मुझे !

ज़हर दे गया तो कभी दवा दे गया मुझे,
हर बार तजरबा तू नया दे गया मुझे !

दर्द कहा, तो कभी इश्क़ को आराम भी कहा,
'फ़राज़' हर हकीम एक नुस्ख़ा दे गया मुझे !

||| फ़राज़ |||

वफ़ा= Fidelity, Faithful
सिला= Gift, Reward
सज़ा= Punishment
बद-दुआ= Curse
वादा= Promise
मशवरा= Advice
उम्र-ए-दराज़= Long Life
गिला= complaint, lamentation, blame
फ़ासला= Distance
दुश्मन-ए-जां= Enemy Of The Heart, Beloved
मरहला= A Stage, An Inn, A Difficulty
तजरबा= Experience
हकीम= Sage, Philosopher, Physician, Doctor
नुस्ख़ा= Prescriptions

सोमवार, 7 अगस्त 2017

तू मेरी बहन है !!!


कभी मेरी दोस्त बन कर
हर राज़ बाँट लेती हो !
कभी माँ की तरह
मुझको डांट लेती हो !

कभी छोटी-छोटी बातों पर
तुम मुझसे लड़ती हो !
कभी पंख मुझे दे देती हो
कभी साथ मेरे तुम उड़ती हो !

कभी मेरे होमवर्क के
सारे सवाल सुलझाती थी !
अब भी मेरी हर एक उलझन
अपनेपन से सुलझाती हो !

मेरी हंसी में हंसती हो
मेरे ग़म में उदास रहती हो !
फ़ासला बस निगाह का है
हमेशा दिल के पास रहती हो !

ज़िन्दगी की दुश्वारियों में
मुझको इतना तो चैन है !
ख़ुदा मुझसे ख़फ़ा नहीं है
क्योंकि तू मेरी बहन है !!!

|||
फ़राज़ |||

बुधवार, 10 मई 2017

दिल-ए-मुफ़्लिस !!!


क्यूँ न दर्द को ही अब हमसफ़र कर लें
एक दर्द ही तो है जो छोड़ कर जाता नहीं !

तेरी पर्देदारियों का एहतराम रखता है
इल्ज़ाम दिल तुझपर कभी लगाता नहीं !

रखता है मुनव्वर सदा तेरी यादों से
शमा-ए-उम्मीद दिल कभी बुझाता नहीं !

एक हम कि हर बार ही तेरी ज़िद करते हैं
एक तू कि ग़लतियां कभी दोहराता नहीं !

यूँ तो नज़रों से है फ़ासला अब सदियों का
ख़ुदाया दिल से आखिर वो क्यूँ जाता नहीं !

क्या ख़बर थी की वो करता है दिल्लगी
वादे हज़ार करता है मगर निभाता नहीं !

तेरी राहों के हवाले ही अब कर दूँ  ज़िन्दगी
बराह-ए-रास्त दूजा अब और नज़र आता नहीं !

ऐ दिल-ए-मुफ़्लिस तू अब न रूठा कर
मुद्दतें गुजरीं कि अब वो मनाता नहीं !

||| फ़राज़ |||

पर्देदारियां= Secrecies.
इल्ज़ाम= Blame
मुनव्वर= Illuminated.
शमा-ए-उम्मीद= Candle of hope.
ज़िद= Insistence.
सदियां= Ages, Centuries.
ख़ुदाया= God.
दिल्लगी= Amusement, Merriment.
बराह-ए-रास्त= Directing, Guiding.
दिल-ए-मुफ़्लिस= Poor Heart. 
मुद्दत= A long time/period