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शनिवार, 28 जुलाई 2018

कवायद !

हर क़दम एक नई दुश्वारी है,
ज़िन्दगी तो फ़िर भी जारी है !

मत सोच नतीजा क्या होगा,
वो कर जो तेरी ज़िम्मेदारी है !

इंसान के इंसान बनने की,
क़वाइद अब भी जारी है !

इसका हिसाब चुकाना होगा,
ये ज़िन्दगी एक उधारी है !

बहुत कमाई है ज़िन्दगी तूने,
बता मौत की क्या तैयारी है?

फ़िर से हैं चुनावी तक़रीरें,
फ़िर भूख मज़हब से हारी है !

जहाँ हम कहें वहां करो सजदा,
हो रहा ये ऐलान सरकारी है !

जो दिल में वो ज़बां पर है,
आदत कुछ ऐसी हमारी है !

कुछ तमाशा तो तू भी कर,
'फ़राज़' ये दौर ही इश्तिहारी है !

||| फ़राज़ |||

क़दम= Step
दुश्वारी= Difficulty
जारी= Proceeding, Continue
नतीजा= Result, Outcome
ज़िम्मेदारी= Responsibility
क़वाइद = Exercise, Drill
चुनावी= Electoral
तक़रीरें= Speeches, Recitals, Orations
मज़हब= Religion
सजदा= Bowing In Prayer So As To Touch The Ground With The Forehead
ऐलान= Announcement, Proclamation, Notification
सरकारी= Governmental, Official
ज़बां= Tongue, Speech
दौर= Time, World
इश्तिहारी= Related To Publicity

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

दुश्वारी!!!

क्या अजब चाहत थी, क्या ग़ज़ब दुश्वारी थी,
घर मेरा मिट्टी का था, बरसात से मेरी यारी थी !
तूफ़ान को भी ख़ुदारा क्यूँ आज ही आना था,
आज ही तो मैंने कश्ती लहरों में उतारी थी !

जब आँख खुली मेरी तो ये इल्म हुआ मुझको
मदहोशी जिसको समझा, वो तो बस ख़ुमारी थी !
न मैंने ही आवाज़ दी, न तुमने मुड़कर देखा,
तुमको भी था ग़ुरूर, मेरी भी कुछ ख़ुद्दारी थी !

जिसकी आतिश में जलकर हम ख़ाक हो गए,
बुझकर भी न बुझ सकी, जाने कैसी चिंगारी थी ! 
'फ़राज़' तेरे इश्क़ को तो नाकाम होना ही था,
तू सुखन का ताजिर था, उसकी नौकरी सरकारी थी !

|||फ़राज़|||

दुश्वारी= Difficulty.
ख़ुदारा= Oh God.
इल्म=Knowledge, Learning.
मदहोशी= Intoxication.
ख़ुमारी= Hangover
ग़ुरूर= Proud
ख़ुद्दारी= Self-respect
आतिश= Fire, Flame
ख़ाक= Dust, Ashes, Worthless.
चिंगारी= Spark, Scintilla.
नाकाम=Unsuccessful, Failure.
सुखन= Speech, Language, Words,
ताजिर= Trader.

सोमवार, 7 अगस्त 2017

तू मेरी बहन है !!!


कभी मेरी दोस्त बन कर
हर राज़ बाँट लेती हो !
कभी माँ की तरह
मुझको डांट लेती हो !

कभी छोटी-छोटी बातों पर
तुम मुझसे लड़ती हो !
कभी पंख मुझे दे देती हो
कभी साथ मेरे तुम उड़ती हो !

कभी मेरे होमवर्क के
सारे सवाल सुलझाती थी !
अब भी मेरी हर एक उलझन
अपनेपन से सुलझाती हो !

मेरी हंसी में हंसती हो
मेरे ग़म में उदास रहती हो !
फ़ासला बस निगाह का है
हमेशा दिल के पास रहती हो !

ज़िन्दगी की दुश्वारियों में
मुझको इतना तो चैन है !
ख़ुदा मुझसे ख़फ़ा नहीं है
क्योंकि तू मेरी बहन है !!!

|||
फ़राज़ |||

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

फ़िर कभी !

तुम ख़्वाब बन के आओ
आँखों में आज रात
इस रात की सुबह को
ढूंढेंगे फ़िर कभी !

बाद मुद्दत उलझा है
तेरी ज़ुल्फ़ से ख़याल,
मेरी उलझनों की गिरहें
खोलेंगे फ़िर कभी !

तू चाँद बनके रात में
आया है फ़लक़ पर,
भर लें तुझे निगाह में
सो लेंगे फ़िर कभी !

बस आज की रात है
कुछ देर ठहर जाओ,
छोड़ जाने का इरादा
कर लेंगे फ़िर कभी !

रह जाओ आग़ोश में ज़रा 
की मिल जाये तसल्ली,
दुश्वारियों का तक़ाज़ा
कर लेंगे फ़िर कभी !

भर लूँ तुझे निगाह में
कल की किसे ख़बर,
इन लम्हों का तजुर्बा
बाँटेंगे फ़िर कभी !

क्या गिला तुझसे करूँ
छोटी सी है ज़िन्दगी,
तेरी नादानियों का शिक़वा
कर लेंगे फ़िर कभी !

|||फ़राज़|||

मुद्दत= A long time, 

गिरहें= A knot, joint, knuckle.
फ़लक़= Sky, Heaven, Firmament.
आग़ोश= Embrace
दुश्वारियों= Difficulties.
तक़ाज़ा= Demand, Pressing Settlement, Urge.
तजुर्बा= Experience.
गिला= Complaint, Reproach
शिक़वा= Complaint