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सोमवार, 7 अगस्त 2017

तू मेरी बहन है !!!


कभी मेरी दोस्त बन कर
हर राज़ बाँट लेती हो !
कभी माँ की तरह
मुझको डांट लेती हो !

कभी छोटी-छोटी बातों पर
तुम मुझसे लड़ती हो !
कभी पंख मुझे दे देती हो
कभी साथ मेरे तुम उड़ती हो !

कभी मेरे होमवर्क के
सारे सवाल सुलझाती थी !
अब भी मेरी हर एक उलझन
अपनेपन से सुलझाती हो !

मेरी हंसी में हंसती हो
मेरे ग़म में उदास रहती हो !
फ़ासला बस निगाह का है
हमेशा दिल के पास रहती हो !

ज़िन्दगी की दुश्वारियों में
मुझको इतना तो चैन है !
ख़ुदा मुझसे ख़फ़ा नहीं है
क्योंकि तू मेरी बहन है !!!

|||
फ़राज़ |||

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

मैं तुझमें सो जाता हूँ !

जब रूठे दिल को अपने
ख़ुद ही बहलाना पड़ता है !
जब मन की हर एक उलझन को
खुद ही सुलझाना पड़ता है !

जब सावन इस मन बंजर को
तुम जैसा सींच नहीं पाता !
और तकिये का एक हिस्सा
जब ख़ाली- ख़ाली लगता है !

तब दिल के इन अंधेरों में
मैं तेरी याद जलाता हूँ !
तू मुझमें जलती रहती है
मैं ही तुझमें सो जाता हूँ !

||| फ़राज़ |||

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

फ़ितरत !!!

तूफ़ान से उलझकर 
सीखा है मैंने जलना,
खायी हज़ार ठोकर
आया है तब संभलना !

एक सिम्त जो हूँ डूबा,
एक सिम्त उग रहा हूँ,
फ़ितरत में हैं उजाले
सीखा न मैंने ढलना !

हर शब तू इम्तेहान ले,
मत भूल मेरी ज़िद को,
मैं शम्स हूँ सहर का
हर रोज़ है निकलना !

अपनी ही उलझनों से
सुलझाये कुछ हुनर हैं,
दरिया सा मुझको बहना,
पुरवाइयों सा चलना !

अहसास की ज़ुबान के
अल्फाज़ तर्जुमा है,
अग़ाज़ कुछ हैं लिखने,
अंजाम हैं बदलना !

शब= Night, रात
सिम्त= Directions, दिशा!
फ़ितरत= Nature, स्वभाव
शम्स= Sun, सूरज
दरिया= River, नदी

||| फ़राज़ |||


सोमवार, 20 मार्च 2017

माँ !!!


मासूम सा दिखता हूँ,
मैं अच्छा सा हो जाता हूँ !
माँ की गोद में फ़िर
मैं बच्चा सा हो जाता हूँ !

मुझको न कोई अँधेरा
कभी बेनूर कर सका !
माँ जब दुआ करती है
मैं उजला सा हो जाता हूँ !

मुझको बिखेरती हैं अक्सर
दुनिया की उलझनें !
माँ सर पर हाथ रखती है
और मैं संवर सा जाता हूँ !

कभी ख़्वाब में जो
कोई हक़ीकत डराती है !
माँ देती है थपकियाँ
और मैं सो जाता हूँ !


||| फ़राज़ |||

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

फ़िर कभी !

तुम ख़्वाब बन के आओ
आँखों में आज रात
इस रात की सुबह को
ढूंढेंगे फ़िर कभी !

बाद मुद्दत उलझा है
तेरी ज़ुल्फ़ से ख़याल,
मेरी उलझनों की गिरहें
खोलेंगे फ़िर कभी !

तू चाँद बनके रात में
आया है फ़लक़ पर,
भर लें तुझे निगाह में
सो लेंगे फ़िर कभी !

बस आज की रात है
कुछ देर ठहर जाओ,
छोड़ जाने का इरादा
कर लेंगे फ़िर कभी !

रह जाओ आग़ोश में ज़रा 
की मिल जाये तसल्ली,
दुश्वारियों का तक़ाज़ा
कर लेंगे फ़िर कभी !

भर लूँ तुझे निगाह में
कल की किसे ख़बर,
इन लम्हों का तजुर्बा
बाँटेंगे फ़िर कभी !

क्या गिला तुझसे करूँ
छोटी सी है ज़िन्दगी,
तेरी नादानियों का शिक़वा
कर लेंगे फ़िर कभी !

|||फ़राज़|||

मुद्दत= A long time, 

गिरहें= A knot, joint, knuckle.
फ़लक़= Sky, Heaven, Firmament.
आग़ोश= Embrace
दुश्वारियों= Difficulties.
तक़ाज़ा= Demand, Pressing Settlement, Urge.
तजुर्बा= Experience.
गिला= Complaint, Reproach
शिक़वा= Complaint