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बुधवार, 17 मई 2017

पैग़म्बरी !!!


महज़ मुनाफ़े के लिए
नहीं होते सभी रिश्ते,
सूरज कभी ज़मीनों से
उजालों का हिसाब नहीं करता !

सुलगते दिल को जब कर दिया
उजालों का जरिया हमने,
अब जलता हुआ दिल
अंधेरों का अस्बाब नहीं बनता !

तू आने हाथों से गढ़ता है
ख़ुद अपनी ही बरबादियाँ,
पानी कभी ख़ुद-ब-ख़ुद
सिफ़त-ए-शराब नहीं बनता !

ये उसे गुमान-ए-हस्ती,
ये वहम उसे पैग़म्बरी का,
अब कभी वो ख़ुदपरस्त
रिश्तों में आदाब नहीं रखता !

इसे शिर्क न समझ ‘फ़राज़’
कि हद है ये इबादत की,
जब वो ज़हन में हो तो मैं
सजदों का हिसाब नहीं रखता !

||| फ़राज़ |||

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

अँधेरे !!!

मेहरबानियाँ उजालों की है जिस्म की रंगत,
अँधेरे कभी रंगतों पर रिआ'यत नहीं करते !

देखते सबकुछ हैं मगर ख़ामोश रहते हैं,
अँधेरे गुनाहों की शिक़ायत नहीं करते !

अस्ल किरदार होते हैं अंधेरों में वो लोग अक्सर,
उजालों में जो लोग कभी शरारत नहीं करते !

वो क्या समझेंगे उजालों के हुस्न को,
जो लोग अंधेरों से कभी सोहबत नहीं करते !

फ़क़त चाँद की तलब में हर शब् चले आते हैं,
ये अँधेरे किसी शम्स की हसरत नहीं करते !

लगता है अँधेरा कोई उनके भी दिल में है,
उजालों से आजकल वो मिल्लत नहीं करते !

||| फ़राज़ |||



मेहरबानियाँ= Kindness
रंगत = colour.
रिआ'यत= Concession
शिक़ायत= Complaint
अस्ल= Real
किरदार= Character
शरारत= Mischief
हुस्न= Beauty
सोहबत= Company, Association 
फ़क़त= Only, Merely
तलब= Desire, Urge
शब्= Night
शम्स= The Sun
हसरत= Desire
मिल्लत= Meeting

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

फ़ितरत !!!

तूफ़ान से उलझकर 
सीखा है मैंने जलना,
खायी हज़ार ठोकर
आया है तब संभलना !

एक सिम्त जो हूँ डूबा,
एक सिम्त उग रहा हूँ,
फ़ितरत में हैं उजाले
सीखा न मैंने ढलना !

हर शब तू इम्तेहान ले,
मत भूल मेरी ज़िद को,
मैं शम्स हूँ सहर का
हर रोज़ है निकलना !

अपनी ही उलझनों से
सुलझाये कुछ हुनर हैं,
दरिया सा मुझको बहना,
पुरवाइयों सा चलना !

अहसास की ज़ुबान के
अल्फाज़ तर्जुमा है,
अग़ाज़ कुछ हैं लिखने,
अंजाम हैं बदलना !

शब= Night, रात
सिम्त= Directions, दिशा!
फ़ितरत= Nature, स्वभाव
शम्स= Sun, सूरज
दरिया= River, नदी

||| फ़राज़ |||