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बुधवार, 17 मई 2017

पैग़म्बरी !!!


महज़ मुनाफ़े के लिए
नहीं होते सभी रिश्ते,
सूरज कभी ज़मीनों से
उजालों का हिसाब नहीं करता !

सुलगते दिल को जब कर दिया
उजालों का जरिया हमने,
अब जलता हुआ दिल
अंधेरों का अस्बाब नहीं बनता !

तू आने हाथों से गढ़ता है
ख़ुद अपनी ही बरबादियाँ,
पानी कभी ख़ुद-ब-ख़ुद
सिफ़त-ए-शराब नहीं बनता !

ये उसे गुमान-ए-हस्ती,
ये वहम उसे पैग़म्बरी का,
अब कभी वो ख़ुदपरस्त
रिश्तों में आदाब नहीं रखता !

इसे शिर्क न समझ ‘फ़राज़’
कि हद है ये इबादत की,
जब वो ज़हन में हो तो मैं
सजदों का हिसाब नहीं रखता !

||| फ़राज़ |||