ज़िन्दगी, तू इतनी क्यूँ ख़फ़ा हो गई,
कि
दर्द ही दर्द की दवा हो गई !
चल
अब मौत से इश्क़ करके देखें,
ज़िन्दगी
तो आदतन बेवफ़ा हो गई !
तेरे मुख़्तसर से ख़याल में डूबे हुए,
आज
फ़िर रात से सुबह हो गई !
जलने
की ज़िद तो पतंगे ने की थी,
बदनाम तो बेवजह ही शमा हो गई !
ख़ुदारा तूने इतनी अक़्ल क्यूँ दे दी,
देख
तेरी ये मख़्लूक़ आप ख़ुदा हो गई !
आज
माँ के चेहरे पर एक सुकून देखा,
अदा नमाज़ और क़ुबूल दुआ हो गई !
जब मेरे
यार ने मुझे गले लगाया,
कि
मेरे हर मर्ज़ की शिफ़ा हो गई !
मेरी बेगुनाही की दलील सिर्फ़ इतनी
है,
मैं
भी इन्सान हूँ,
मुझसे
भी ख़ता हो गई !
ख़ुद पे यक़ीन रखके मैं आगे बढ़ता रहा,
'फ़राज़' मुकम्मल हर एक दुआ हो
गई !
||| फ़राज़ |||
ख़फ़ा= Displeased, Angry
आदतन= Habitually
बेवफ़ा= Faithless, Treacherous
मुख़्तसर= Concise, Short, Brief
ख़याल= Thought
ज़िद= Insistence
पतंगा= Moth
बदनाम= Defame, Malign
बेवजह= Without reason
शमा= Candle
ख़ुदारा= God
अक़्ल= Wisdom, Brain, Knowledge
मख़्लूक़= Creation
आप= Self
सुकून= Peace
नमाज़= prayer (especially as prescribed by the Muslim law)
क़ुबूल= Accept
दुआ= benediction
मर्ज़= Sickness, Illness
शिफ़ा= Cure, Healing
बेगुनाही= Innocence
दलील= Argument
ख़ता= Mistake, Fault
ख़ुद= Self, Oneself
यक़ीन= Trust, Confidence
मुकम्मल= Complete