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बुधवार, 2 मई 2018

आतिश-ए-इश्क़ !!!

क्या ख़ूब बला है ये आतिश-ए-इश्क़,
कि जलने में भी मज़ा, और जलाने में भी !

कहें तो कैसे कहें कि बात है दिल की,
जिसे कहने में भी मज़ा और छुपाने में भी !

मज़ा इसमें भी है कि उनको जलाया जाए,
कि जिनसे रूठने में भी मज़ा, जिनको मनाने में भी !

दिल को खिलौना ही समझ कर खेल लीजिये,
आपसे तो जीतने में भी मज़ा, और हार जाने में भी !

तेरे इश्क़ की हर शर्त है मंज़ूर हमको,
जिन्हें तोड़ने में भी मज़ा और निभाने में भी !

ये इश्क़ का नशा है, हर हाल में मज़ा है,
है दिल्लगी में भी मज़ा और दिल के लगाने में भी !

दिल के सौदे में कभी 'फ़राज़' का ख़सारा न हुआ,
है मिलन में भी मज़ा, और बिछड़ जाने में भी !

||| फ़राज़ |||

आतिश-ए-इश्क़= Fire Of Love
शर्त= Condition, 
मंज़ूर= Accept
हाल= State, Condition,
दिल्लगी= Amusement, Merriment
ख़सारा= Loss

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

वो हमारा कब था !

दिल्लगी का इल्ज़ाम भला उसको क्यूँ दें,
हम ही तो उसके थे वो हमारा कब था !

जिस नाख़ुदा के हवाले थी कश्ती अपनी,
वो तो एक मौज था, वो किनारा कब था !

जिसके तसव्वुर पर हम दिल हार बैठे थे,
उसकी ज़ुल्फ़ों को अभी हमने संवारा कब था !

उसका ज़िक्र तो सिर्फ़ धड़कन से किया था,
उस नाम को होंठों से अभी पुकारा कब था !

अभी नज़र भरके देखा भी न था उसको,
दिल में उस चाँद से चेहरे को उतारा कब था !

दीदार की ख़ातिर सिर्फ़ हम ही बेक़रार न थे,
हमको देखे बिना उसका भी गुज़ारा कब था !

एक दुश्मन-ए-जां से मानूस हो बैठा है,
इतना मजबूर ये दिल या ख़ुदारा कब था !

उससे तो हर तक़ाज़ा अब महशर में होगा,
क़र्ज़ मेरी वफ़ाओं का उसने उतारा कब था !

कैसे जीता रहा भला तू मुझसे जुदा हो के,
एक लम्हा भी तो मेरे बिना गवारा कब था !

तूने तो दिल हार कर मैंने जीता था उसको,
'फ़राज़' दिल के सौदे में कोई ख़सारा कब था !


|||फ़राज़|||


दिल्लगी= Amusement, Merriment
इल्ज़ाम= Blame, Acquisition.
नाख़ुदा= Boatman, Sailor, Master of the ship.
कश्ती= Boat
मौज= Wave.
तसव्वुर= Imagination, Contemplation, 
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
दीदार= Appearance, Sight.
ख़ातिर= For the sake.
बेक़रार= Restless
गुज़ारा= Passage.
दुश्मन-ए-जां= Enemy of the heart, Beloved.
मानूस= Intimate, Associate, Friendly,
ख़ुदारा= Oh God.
तक़ाज़ा= Demand, Urge, pressing settlement of the claim.
महशर= Tumult, Day of resurrection, The Place of rising and assembling after death.
वफ़ा= Fidelity, Faithfulness.
गवारा= Tolerable, Acceptable, Bearable.
ख़सारा= Loss.

रविवार, 25 दिसंबर 2016

एक ख़्वाब का सौदा !!!

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !

तू बनके ख़्वाब सिरहाने पर
तकिये पर अक्सर मिलता है !
हौले-हौले थपकी देकर
तू दूर कहीं ले जाता है !

जहाँ वक़्त के धागे लम्हों को
बंधन में बाँध नहीं पाते !
जहाँ उम्र थमी है बरसों से
जहाँ साथ थी भीगी बरसातें !

कुछ लम्हे जो थे ख़्वाब हुए
अब ख़्वाब में अक्सर मिलते हैं !
एक हसरत की सूरत बनकर
अहसास से बनकर मिलते हैं !

चादर पर सिलवट के जैसा तू
मन में सिलवट दे जाता है !
पलकों की मुंडेरों को तू
फिर से तर कर जाता है !

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !


|||फ़राज़|||