हर रात मैं
अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का
सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब,
तो टूट ही जाना है
पर नींदें
ख़र्चा करता हूँ !
तू बनके ख़्वाब
सिरहाने पर
तकिये पर
अक्सर मिलता है !
हौले-हौले
थपकी देकर
तू दूर कहीं
ले जाता है !
जहाँ वक़्त
के धागे लम्हों को
बंधन में
बाँध नहीं पाते !
जहाँ उम्र
थमी है बरसों से
जहाँ साथ थी
भीगी बरसातें !
कुछ लम्हे जो
थे ख़्वाब हुए
अब ख़्वाब
में अक्सर मिलते हैं !
एक हसरत की
सूरत बनकर
अहसास से
बनकर मिलते हैं !
चादर पर सिलवट के जैसा तू
मन में
सिलवट दे जाता है !
पलकों की
मुंडेरों को तू
फिर से तर
कर जाता है !
हर रात मैं
अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का
सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब,
तो टूट ही जाना है
पर नींदें
ख़र्चा करता हूँ !
|||फ़राज़|||