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सोमवार, 15 अप्रैल 2019

हालात

आवारगी के हमपे ज़माने आए,
जबसे हम इस शहर में कमाने आए !

इतनी सी देर को हम घर आते हैं,
जैसे कि कोई क़र्ज़ चुकाने आए !

वक़्त बदला तो फ़िर ऐसा बदला,
तीर पे ख़ुद चल के निशाने आए !

कुछ लोग तेरा ज़िक्र छेड़ देते हैं,
जब आए तो बस आग लगाने आए !

बिछड़ के वो ख़ुश भी हैज़िन्दा भी है,
वादे भी कहाँ उसको निभाने आए !

जागे तो देखा कि तकिया नम था,
कल रात तेरे ख़्वाब सिरहाने आए !

सुर्ख़ जोड़े
 में वो आए मेरी मय्यत पे,
कुछ इस तरह वो हमको जलाने आए !

'अल्फ़ाज़हमने ख़ुद को ख़ुद ही मना लिया,
बहुत देर में वो हमको मनाने आए !

||| अल्फ़ाज़ |||

आवारगी = Wandering, Loitering, Waywardness
ज़माने = Times, Age, Era, काल, समय
क़र्ज़ = Debt, Loan, ऋण, उधार
ख़ुद = Self, Oneself, स्वयं
तीर = Arrow, बाण
ज़िक्र = Narration, Talk, बात, चर्चा
सुर्ख़-जोड़ा = Red Wedding Dress
मय्यत = Dead Body, Corpse, अर्थी, अंतिम-संस्कार

रविवार, 25 दिसंबर 2016

एक ख़्वाब का सौदा !!!

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !

तू बनके ख़्वाब सिरहाने पर
तकिये पर अक्सर मिलता है !
हौले-हौले थपकी देकर
तू दूर कहीं ले जाता है !

जहाँ वक़्त के धागे लम्हों को
बंधन में बाँध नहीं पाते !
जहाँ उम्र थमी है बरसों से
जहाँ साथ थी भीगी बरसातें !

कुछ लम्हे जो थे ख़्वाब हुए
अब ख़्वाब में अक्सर मिलते हैं !
एक हसरत की सूरत बनकर
अहसास से बनकर मिलते हैं !

चादर पर सिलवट के जैसा तू
मन में सिलवट दे जाता है !
पलकों की मुंडेरों को तू
फिर से तर कर जाता है !

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !


|||फ़राज़|||