जाने कैसा मरहम सा रखती हैं,
जाने कैसी ख़ुदायी हैं वो दो आँखें !
कभी जूनून तो कभी तसल्ली सी,
काजल की स्याही हैं वो दो आँखें !
पलकें बंद कर लीं जब दिल घबराया,
पास चली आयीं वो दो आँखें !
मंज़िल न सही, वो हमसफ़र हैं मेरी,
बाँटती हैं मेरी तन्हाई वो दो आँखें !
कभी ज़िन्दगी ने जो दी अज़ीयत,
छू गयीं जैसे पुरवाई वो दो आँखें !
आज फ़ुरक़त जो सर-ए-शाम आई,
दिल में जगमगायीं हैं वो दो आँखें !
फ़राज़...