आज तेरा ख़त जला दिया मैंने,
राख़ के पुर्ज़े से हुए अहसास मेरे!
राख़ के रंगत से स्याह दिखते हैं,
क्या रंग लाये हैं अल्फाज़ तेरे!
बोझ से आज पलकें बंद कर ली मैंने
बरसों तलक उठाये हमने नाज़ तेरे!
तुझपे यकीं तो था, इल्म-ए-ग़ैब न था
आहिस्ता आहिस्ता खुले हैं राज़ तेरे!
आज सफ़र का रुख़ कर लेते हैं,
बहुत मुन्तज़िर रह लिए फ़राज़ तेरे!
फ़राज़....
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