शनिवार, 31 दिसंबर 2016

एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

गर दुनियावाले पूछें की
तेरा मेरा रिश्ता क्या है,
तू भूल जिसे न पाया है
आख़िर तेरा लगता क्या है,
तुम हंस के बात बना देना
कहना तुमको अब याद नहीं,
एक याद है बस भूली-बिसरी
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

गर शाम ढले फिर तन्हाई
अहवाल मेरा फिर पूछे तो,
जब तुझसे तेरी परछांई
गर हाल मेरा फिर पूछे तो,
इल्ज़ाम मुझे सब दे देना
तुम कहना उनसे राज़ नहीं,
बस दर्द-ओ-ग़म का बाईस था
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

जब जिस्म तेरा न तन्हा हो
पर रूह मेरी ज़िद को तड़पे,
जब चोट कोई तुमको पहुंचे
दिल याद मेरी करके तड़पे,
तुम लाख बुलाना चाहो जब
पहुंचे मुझतक आवाज़ नहीं,
तब लौट के फ़िर न आएगा
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !


फ़राज़...

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