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बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

सलाह !!!

हर हार को तुम कुछ यूँ हरा देना,
मुश्किल जो आ जाये तो मुस्कुरा देना !

क्या ख़बर तुझे इसी राह से लौटना भी हो,
रास्ते के हर पत्थर को तुम हटा देना !

इससे बेहतर इबादत क्या होगी मौलवी साहब,
दो प्यार करने वालों को मिला देना !

दुआ अगर अर्श तक पहुँचाना चाहो,
क़ैद परिंदों को तुम उड़ा देना !

तेरा सिक्का न चलेगा बाद मरने के,
क़र्ज़ ज़िन्दगी में सभी तुम चुका देना !

बात दिल की हो तो दिल में रखना,
अगर कोई दिल से पूछे तो बता देना !

होके मदहोश तो वो सच बोलेगा ही,
'फ़राज़' को धोखे से तुम पिला देना !

अहवाल अगर वो मेरा दरयाफ़्त करे,
मेरे अशआर तुम उसको सुना देना !

वो फ़िर मिलेगा एक नया चेहरा लेकर,
आइना टूटा हुआ उसको दिखा देना !

कुछ तो गुनाह तेरे माफ़ हो जायेंगे ज़रूर,
किसी रोते हुए बच्चे को तू हँसा देना !

रौशनी महदूद न रहे महज़ दिवाली तक,
चराग़ हर अमावास रात में तुम जला देना !

|||फ़राज़|||

इबादत= Prayer, Adoration.
अर्श= Sky
क़ैद= Imprisonment, Bondage,
परिंदे= Birds
क़र्ज़= Debt, Loan.
मदहोश= Intoxicated.
अहवाल= Condition, State, Circumstance.
दरयाफ़्त= Inquiry, Investigation.
महदूद= Bound, Restrict.
महज़= Merely, Only.
चराग़= An oil lamp.

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

गर दुनियावाले पूछें की
तेरा मेरा रिश्ता क्या है,
तू भूल जिसे न पाया है
आख़िर तेरा लगता क्या है,
तुम हंस के बात बना देना
कहना तुमको अब याद नहीं,
एक याद है बस भूली-बिसरी
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

गर शाम ढले फिर तन्हाई
अहवाल मेरा फिर पूछे तो,
जब तुझसे तेरी परछांई
गर हाल मेरा फिर पूछे तो,
इल्ज़ाम मुझे सब दे देना
तुम कहना उनसे राज़ नहीं,
बस दर्द-ओ-ग़म का बाईस था
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

जब जिस्म तेरा न तन्हा हो
पर रूह मेरी ज़िद को तड़पे,
जब चोट कोई तुमको पहुंचे
दिल याद मेरी करके तड़पे,
तुम लाख बुलाना चाहो जब
पहुंचे मुझतक आवाज़ नहीं,
तब लौट के फ़िर न आएगा
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !


फ़राज़...