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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

मोहब्बत

ये जो उनसे ज़रा सी शिकायत हुई,
देखिये तो सही क्या मोहब्बत हुई !

चोट प्यारी सी है, दर्द मीठा सा है,
दिल को भी एक अजब सी अज़ीयत हुई ! 

एक तेरे सिवा सूझता कुछ नहीं,
अब ज़हन की भी दिल जैसी हालत हुई !

आज मेरे लिए मुस्कुरा वो दिए,
ज़िन्दगी ख़ुशनुमा, पुर-मसर्रत हुई !

दिल में महफ़िल है, त्यौहार और जश्न है,
इश्क़ इतवार की जैसे फ़ुर्सत हुई !

हर तसव्वुर तेरा है अदब से किया,
इस तरह आशिक़ी भी इबादत हुई !

उनके आने से 'अल्फ़ाज़' की ज़िन्दगी,
मेहरबान और ख़ूबसूरत हुई !

||| अल्फ़ाज़ |||

शिकायत = Complaint
अजब = Strange, Wonderful, 
अज़ीयत = Trouble, Suffering, 
ज़हन = Mind, Brain, 
ख़ुशनुमा = Pleasant, Beautiful, 
पुरमसर्रत = Joyous, Full Of Happiness
महफ़िल = Party, The Congregation
त्यौहार = Festival
जश्न = A Feast, A Jubilee, Celebration
फ़ुर्सत = Leisure, Freedom, Rest
तसव्वुर = Imagination, Contemplation,
अदब = Respect, Courtesy
आशिक़ी = Love, State Of Being In Love Courtship
तसव्वुर = Imagination, Contemplation,
अदब = Respect, Courtesy
आशिक़ी = Love, State Of Being In Love Courtship
इबादत = Prayer, Worship
मेहरबान = Benign, Kind,

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

सिफ़र!!!

सख्त़ धूप में जब मेरा सफ़र हो गया,
कच्ची मिट्टी सा था, मैं पत्थर हो गया !

चोट सहने का हुनर भी सीखा मैंने,
ख़ुद को तराशा तो मैं संगमरमर हो गया !

ऐ ठोकरों सुनो, तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूँ मैं,
गिरते सँभालते मैं भी रहबर हो गया !

एक तू मिल गया तो कई गुना सा हूँ,
एक तू नहीं तो मैं तन्हा सिफ़र हो गया !

शहर में मैंने जब घर ख़रीद लिया,
अपना सा ये सारा शहर हो गया !

आज माँ को फ़िर हंसाया मैंने,
नूर ही नूर मेरा सारा घर हो गया !

क़त्ल आज मैंने अपना माफ़ किया,
अपने क़ातिल पर मैं ज़बर हो गया !

तेरे दुश्मन की दाद तुझे हासिल है,
कामिल 'फ़राज़' तेरा हुनर हो गया !

|||फ़राज़|||

तराशा= chiselled
शुक्रगुज़ार=Thankful.Grateful.
रहबर= Guide, 
सिफ़र= Zero.Naught.
नूर=Light, Splendour.
क़त्ल= Murder.
क़ातिल= Murderer.
ज़बर= Superior, Greater
दाद= Words of praise.
कामिल= Perfect, Complete, Accomplished, Entire.

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

गर दुनियावाले पूछें की
तेरा मेरा रिश्ता क्या है,
तू भूल जिसे न पाया है
आख़िर तेरा लगता क्या है,
तुम हंस के बात बना देना
कहना तुमको अब याद नहीं,
एक याद है बस भूली-बिसरी
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

गर शाम ढले फिर तन्हाई
अहवाल मेरा फिर पूछे तो,
जब तुझसे तेरी परछांई
गर हाल मेरा फिर पूछे तो,
इल्ज़ाम मुझे सब दे देना
तुम कहना उनसे राज़ नहीं,
बस दर्द-ओ-ग़म का बाईस था
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

जब जिस्म तेरा न तन्हा हो
पर रूह मेरी ज़िद को तड़पे,
जब चोट कोई तुमको पहुंचे
दिल याद मेरी करके तड़पे,
तुम लाख बुलाना चाहो जब
पहुंचे मुझतक आवाज़ नहीं,
तब लौट के फ़िर न आएगा
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !


फ़राज़...