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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

मोहब्बत

ये जो उनसे ज़रा सी शिकायत हुई,
देखिये तो सही क्या मोहब्बत हुई !

चोट प्यारी सी है, दर्द मीठा सा है,
दिल को भी एक अजब सी अज़ीयत हुई ! 

एक तेरे सिवा सूझता कुछ नहीं,
अब ज़हन की भी दिल जैसी हालत हुई !

आज मेरे लिए मुस्कुरा वो दिए,
ज़िन्दगी ख़ुशनुमा, पुर-मसर्रत हुई !

दिल में महफ़िल है, त्यौहार और जश्न है,
इश्क़ इतवार की जैसे फ़ुर्सत हुई !

हर तसव्वुर तेरा है अदब से किया,
इस तरह आशिक़ी भी इबादत हुई !

उनके आने से 'अल्फ़ाज़' की ज़िन्दगी,
मेहरबान और ख़ूबसूरत हुई !

||| अल्फ़ाज़ |||

शिकायत = Complaint
अजब = Strange, Wonderful, 
अज़ीयत = Trouble, Suffering, 
ज़हन = Mind, Brain, 
ख़ुशनुमा = Pleasant, Beautiful, 
पुरमसर्रत = Joyous, Full Of Happiness
महफ़िल = Party, The Congregation
त्यौहार = Festival
जश्न = A Feast, A Jubilee, Celebration
फ़ुर्सत = Leisure, Freedom, Rest
तसव्वुर = Imagination, Contemplation,
अदब = Respect, Courtesy
आशिक़ी = Love, State Of Being In Love Courtship
तसव्वुर = Imagination, Contemplation,
अदब = Respect, Courtesy
आशिक़ी = Love, State Of Being In Love Courtship
इबादत = Prayer, Worship
मेहरबान = Benign, Kind,

बुधवार, 28 नवंबर 2018

दुआ

नीयत का साफ़दिल का सच्चा हो जाऊँ,
ऐ काश कि मैं फ़िर से बच्चा हो जाऊँ !

मज़हब का मज़हब से कोई झगड़ा न रहेगा,
तू सही हिन्दू बनमैं सही मुसलमाँ हो जाऊँ !

लिखा है बहुत सोच के ये राज़-ए-मग़फ़िरत,
हो जाऊँ जन्नती अगर मैं इंसाँ हो जाऊँ !

मेरे लिए बनाया है अल्लाह ने सबकुछ,
पी जाऊँ समंदर अगर मैं तिश्ना हो जाऊँ !

लोगों को तो ख़ुदा से भी शिकायत है आजकल,
मुझसे भी रहेगीचाहे मैं जितना अच्छा हो जाऊँ !

ज़िन्दा रहूँगा मैं सदा अशआ' में अपने,
हो जाऊँ मैं दफ़्न चाहे मैं धुआँ हो जाऊँ !

जी-हुज़ूरी का दौर है 'अल्फ़ाज़इस क़दर,
कि तोड़ दिया जाऊँ अगर मैं आईना हो जाऊँ !

||| अल्फ़ाज़ ||| 

नीयत = Intention, Purpose
मज़हब = Religion 
मुसलमाँ = The Muslim
राज़-ए-मग़फ़िरत = Secret Of Absolution/Pardon/Forgiveness
जन्नती= Dweller In Paradise
इंसाँ= Human Being, Mankind
तिश्ना = Thirsty, Insatiable, Eagerly
शिकायत = Complaint
अशआ'र= Couplets
दफ़्न= Burial
जी-हुज़ूरी= Yes Man; Sycophancy; "Yes Your Honour"
दौर= Age, Era, Time

क़दर= So Much, To Such A Degree

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

तसल्ली !!!

महज़ कांटे ही महफ़ूज़ हैं इस ज़माने में,
फूल तो मसल जाते हैं राहों को सजाने में !

कभी अपनों की शिकायत ग़ैरों से कीजिये,
कोई पीछे न रहेगा आग लगाने में !

इतना महँगा भी नहीं है तसल्ली देना,
इतना ख़र्चा भी नहीं है मुस्कुराने में !

कोई अपना रूठ जाए तो उसे मना लेना,
एक उम्र लगती है रिश्तों को बनाने में !

नफ़रत अगर चाहिए तो मुफ़्त मिलेगी,
मगर प्यार ख़र्च होता है प्यार कमाने में !

इक़रार न सही तो इंकार ही सही,
कुछ तो हासिल होगा दिल आज़माने में !

तुझे याद तो महज़ इसलिए करता हूँ,
मुझे आराम मिलता है दिल जलाने में !

तेरी हसरत तो करता हूँज़िद नहीं करता,
कोई बुराई तो नहीं तुझे इस तरह चाहने में !

गुनाह तो तब है कि जब मयकशी की जाये,
कोई गुनाह नहीं 'फ़राज़मयकदे जाने में !

||| फ़राज़ |||

महज़ = Merely, Only
महफ़ूज़ = Safe
ज़माना = World, Era
शिकायत = Complaint, Lamentation
ग़ैर = Stranger, Rival, Outsider 
तसल्ली = Solace, Consolation, Comfort
ख़र्चा = Expense
नफ़रत = Hate
इक़रार = Consent, Pledge
इंकार = Denial, Refusal
हासिल = Gain, Result
आज़माना = Try, Test
हसरत = Desire
ज़िद = Insistence
गुनाह = Sin, Crime, Fault
मयकशी = Boozing, To Drink
मयकदे= Bar, Tavern

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

!!! शिकायत !!!

अहद तो रूठने का था मगर मैं रूठा न रह सका,
जाने तुझे शिकायत ज़्यादा थी या मोहब्बत ज़्यादा !

||| फ़राज़ |||

अहद= Promise