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शनिवार, 3 अगस्त 2019

क्यूँ है

एक ख़ौफ़ का ये मंज़र क्यूँ है,
अपने ही घर में डर क्यूँ है !

झगड़ा तो है इंसानों का,
रुसवा मस्जिद-मंदिर क्यूँ है !

जिन हाथों में मुस्तक़बिल था,
उन हाथों में पत्थर क्यूँ है !

जो बात ज़रूरी है कहनी,
वो ही दिल के अंदर क्यूँ है !

तुमको भी इश्क़ हुआ था न,
इल्ज़ाम सिरफ़ मुझ पर क्यूँ है !

कहते हैं इसको बड़ा शहर,
तो इतने छोटे घर क्यूँ हैं !

कुछ करना है तो कर डालो,
इतनी भी अगर मगर क्यूँ है !

अल्फ़ाज़’ के दुश्मन ज़ाहिर थे,
तो पीठ में ये ख़ंजर क्यूँ है !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़ौफ़ = Fear, Dread, Terror, भय
मंज़र = Scene, View, दृश्य
रुसवा = Dishonored, Despondent, अपमानितहताश
मुस्तक़बिल = Future, भविष्य
इल्ज़ाम = Allegation, Blame, आरोप
सिरफ़ = Only, मात्र
ज़ाहिर = Evident, Open, प्रत्यक्ष

बुधवार, 10 अप्रैल 2019

ज़रुरत

अल्लाह न भगवान की ज़रुरत है,
इन्सान को इन्सान की ज़रुरत है !

दैर-ओ-हरम को बनाने से पहले,
दिलों में ईमान की ज़रुरत है !

महज़ हिफ़्ज़ करने से कुछ नहीं होगा,
दिलों में क़ुरआन की ज़रुरत है !

घर को ज़रूरी नहीं हैं ज़्यादा कमरे,
हँसते हुए दालान की ज़रुरत है !

रिश्तों को नहीं चाहिए हीरे-मोती,
रिश्तों को बस ध्यान की ज़रुरत है !

चहार-दीवारी में घुट रहा बचपन,
बच्चों को मैदान की ज़रुरत है !

सवाल उठते हैं तेरी ख़ामोशी पर,
दरिया तो तूफ़ान की ज़रुरत है !

'अल्फ़ाज़महज़ दोस्ती के रिश्ते में,
न हिन्दू न मुसलमान की ज़रुरत है !

||| अल्फ़ाज़ |||
इन्सान = Human, Mankind, मनुष्य
ज़रुरत = Requirement, Need, आवश्यकता
दैर-ओ-हरम = Temple And Mosque, मंदिर-ओ-काबा
ईमान = Belief, Conscience, Faith
हिफ़्ज़ = To Memorize, कंठस्थ
क़ुरआन = The Holy Quran
दालान = Verandah, Lobby
चहार-दीवारी = Boundary
ख़ामोशी = Silence, मौन 
दरिया = River, नदी
महज़ = Merely, Only, केवल, मात्र


बुधवार, 28 नवंबर 2018

दुआ

नीयत का साफ़दिल का सच्चा हो जाऊँ,
ऐ काश कि मैं फ़िर से बच्चा हो जाऊँ !

मज़हब का मज़हब से कोई झगड़ा न रहेगा,
तू सही हिन्दू बनमैं सही मुसलमाँ हो जाऊँ !

लिखा है बहुत सोच के ये राज़-ए-मग़फ़िरत,
हो जाऊँ जन्नती अगर मैं इंसाँ हो जाऊँ !

मेरे लिए बनाया है अल्लाह ने सबकुछ,
पी जाऊँ समंदर अगर मैं तिश्ना हो जाऊँ !

लोगों को तो ख़ुदा से भी शिकायत है आजकल,
मुझसे भी रहेगीचाहे मैं जितना अच्छा हो जाऊँ !

ज़िन्दा रहूँगा मैं सदा अशआ' में अपने,
हो जाऊँ मैं दफ़्न चाहे मैं धुआँ हो जाऊँ !

जी-हुज़ूरी का दौर है 'अल्फ़ाज़इस क़दर,
कि तोड़ दिया जाऊँ अगर मैं आईना हो जाऊँ !

||| अल्फ़ाज़ ||| 

नीयत = Intention, Purpose
मज़हब = Religion 
मुसलमाँ = The Muslim
राज़-ए-मग़फ़िरत = Secret Of Absolution/Pardon/Forgiveness
जन्नती= Dweller In Paradise
इंसाँ= Human Being, Mankind
तिश्ना = Thirsty, Insatiable, Eagerly
शिकायत = Complaint
अशआ'र= Couplets
दफ़्न= Burial
जी-हुज़ूरी= Yes Man; Sycophancy; "Yes Your Honour"
दौर= Age, Era, Time

क़दर= So Much, To Such A Degree

शनिवार, 3 नवंबर 2018

मंज़र

एक सवाल में उलझा हूँ उम्र भर से मैं,
कि मंज़र गुज़र जाता है या मंज़र से मैं !

यहाँ अभी न हिंदू
, न मुसलमान हूँ मैं,
शहर मुझसे अजनबी है और शहर से मैं !

इंसान से तो सीखा है ख़ुदगर्ज़ होना,
सख़ावत तो सीखा हूँ शजर से मैं !

मैं कहीं रहूँदिल तो घर पे रहता है,
न घर मुझसे दूर है, न घर से मैं !

कोई माटी का तो कोई बुत तसव्वुर का,
डरता हूँ अपने ही बनाये डर से मैं !

वो आ के थम जाएगी मेरे साहिल पर,
उम्मीद लगाये बैठा था एक लहर से मैं !

हर मील का पत्थर ये गवाही देगा,
कि सफ़र मुझसे था या सफ़र से मैं !

मर्तबे बिकते नहीं हैं  बाज़ारों में,
'अल्फ़ाज़बना हूँ अपने हुनर से मैं !

||| अल्फ़ाज़ |||

मंज़र= Scene, View
ख़ुदगर्ज़= Selfish
सख़ावत= Generosity
शजर= Tree
माटी= Mud, Clay, Silt
बुत= Idol
तसव्वुर= Imagination
मर्तबा= Account, Class, Degree, Office
हुनर= Art, Skill, Talent

सोमवार, 3 सितंबर 2018

मंज़िल


दूर सही, एक मंज़िल है,
धुंधला ही सही, एक साहिल है !

कुछ भी नहीं है नामुमकिन,
एक राह ज़रा सी मुश्किल है !

दुनिया की फ़िक्र में ऐ इंसाँ,
तू ख़ुद से क्यूँ इतना ग़ाफ़िल है !

मत हार, लड़ाई बाक़ी है,
जीता न सही, तू क़ाबिल है !

चादर में समेटो पैरों को,
क़िस्मत में था जितनाहासिल है !

जहाँ कोई क़दम न पहुँचा हो,
फ़राज़की वही तो मंज़िल है !

||| फ़राज़ |||

मंज़िल= Stage, Destination
साहिल= The Sea-Shore, Coast, Beach
नामुमकिन= Impossible
फ़िक्र= Concern, Thought
इंसाँ= Human, Mankind
ग़ाफ़िल= Negligent, Oblivious
क़ाबिल= Able, Competent, Deserving
हासिल= Gain, Profit