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बुधवार, 10 अप्रैल 2019

ज़रुरत

अल्लाह न भगवान की ज़रुरत है,
इन्सान को इन्सान की ज़रुरत है !

दैर-ओ-हरम को बनाने से पहले,
दिलों में ईमान की ज़रुरत है !

महज़ हिफ़्ज़ करने से कुछ नहीं होगा,
दिलों में क़ुरआन की ज़रुरत है !

घर को ज़रूरी नहीं हैं ज़्यादा कमरे,
हँसते हुए दालान की ज़रुरत है !

रिश्तों को नहीं चाहिए हीरे-मोती,
रिश्तों को बस ध्यान की ज़रुरत है !

चहार-दीवारी में घुट रहा बचपन,
बच्चों को मैदान की ज़रुरत है !

सवाल उठते हैं तेरी ख़ामोशी पर,
दरिया तो तूफ़ान की ज़रुरत है !

'अल्फ़ाज़महज़ दोस्ती के रिश्ते में,
न हिन्दू न मुसलमान की ज़रुरत है !

||| अल्फ़ाज़ |||
इन्सान = Human, Mankind, मनुष्य
ज़रुरत = Requirement, Need, आवश्यकता
दैर-ओ-हरम = Temple And Mosque, मंदिर-ओ-काबा
ईमान = Belief, Conscience, Faith
हिफ़्ज़ = To Memorize, कंठस्थ
क़ुरआन = The Holy Quran
दालान = Verandah, Lobby
चहार-दीवारी = Boundary
ख़ामोशी = Silence, मौन 
दरिया = River, नदी
महज़ = Merely, Only, केवल, मात्र


मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

अशआर !!!

दर्द खरीदने आया हूँ फ़िर दिल के बदले,
आज गाहक फ़िर मैं तेरी दुकान का हूँ !

मैंने ही जुर्म किया था मोहब्बत करके,
मुस्ताहिक़ तो बस मैं ही सज़ा का हूँ !

तेरी कहानी में मेरा ज़िक्र तो आना ही था,
मुख़्तसर ही सही, क़िस्सा तेरी दास्ताँ का हूँ !

तुझको चाहा बहुत मगर  पूज सका,
शायर हूँ, न की मुन्किर मैं ख़ुदा का हूँ !

भटक के बहुत दूर निकल आया हूँ,
मुसाफ़िर तो मैं तेरे ही कारवां का हूँ !

जलता देखा है क्या कभी अपने घर को,
मुझसे सुनो, मुसलमान मैं बर्मा का हूँ !

अबकी आये तो कभी छोड़कर न जाए,
मुन्तज़िर मैं ऐसे किसी महमाँ का हूँ !

प्यार के लालच में ही फँस जाता हूँ,
यूँ तो पक्का मैं भी ईमान का हूँ !

उनकी आँखें मुझे देख के जगमगाती हैं,
सितारा मैं माँ बाप की निगाह का हूँ !

पहले तुम मेरे अशआर तो पढ़कर देखो,
फ़िर बतलाओ इन्सान मैं किस तरह का हूँ !

|||फ़राज़|||

गाहक= Customer.
मुस्ताहिक़= Deserving
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
मुख़्तसर= Brief, Short.
क़िस्सा= Tale, Story
दास्ताँ= Story, Fable, Tale.
मुन्किर= Rejecting, Atheist, One who denies.
मुसाफ़िर= Traveller.
कारवां= Caravan. A company of travellers.
मुन्तज़िर= Expectant, One who waits.
महमाँ= Guest.
ईमान= Belief, conscience, Faith
अशआर= Couplets



शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

दिवाली !!!

इस दिवाली अँधेरा कुछ यूँ मिटाया मैंने,
एक दिया मस्जिद में भी जलाया मैंने !

मज़हबी दीवार में खोल के मन की खिड़की,
मंदिर को मस्जिद से कुछ यूँ मिलाया मैंने !

एक रूठा हुआ दोस्त फ़िर नज़र आया,
भूलकर शिक़ायतें गले उसको लगाया मैंने !

एक दिये की लौ में जब तू नज़र आया,
हर दिया फ़िर तुझे याद करके जलाया मैंने !

ग़रज़ थी अपने पड़ोस को खुशबू से भरना,
घर अपना उनके लिए था महकाया मैंने !

पड़ोसी की एक दीवार भी सज गई थी,
यूँ तो घर बस अपना था सजाया मैंने !

तेरे आँगन में भी फल और छाँव देगा,
शजर जो अपने आँगन में है लगाया मैंने !

माना कि जायज़ नहीं मुसलमान पर लेकिन,
उस्ताद के पैरों को हाथ था लगाया मैंने !

|||फ़राज़|||

मज़हबी= Religious.
ग़रज़= Intention, Purpose.
शजर= Tree
जायज़= Legitimate. Prevailing.
उस्ताद= Teacher. 

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

मैं !!!

तुझको अक्सर मैं छू के गुजरूँगा,
झौंका मैं इसी शहर की हवा का हूँ !

मेरा बचपन तेरे आँगन में भी तो खेला है,
बच्चा तो मैं पड़ोस के ही मकां का हूँ !

मुझको बहला न पाओगे तुम चराग़ों से,
मैं तलबगार तो सिर्फ़ कहकशां का हूँ !

अरे ओ मेरी रौशनी से जलने वालों,
अभी सितारा तो बस मैं सुबह का हूँ !

जानवर खाने का शौक़ मैं भी रखता हूँ,
मुसलमान मैं भी कहाँ ख़्वाह-मख़ाह का हूँ !

अज़ान के वक़्त तुम भी ज़रा ख़ामोश रहो,
यूँ तो पाबंद मैं भी गुनाह का हूँ !

मुझको हिंदी में मज़हब तुम सिखलाओ,
मैं आलिम कहाँ अरबी ज़बां का हूँ !

क्यूँ न हो ग़ुरूर मुझे अपनी हस्ती पर,
ज़र्रा तो मैं भी उसी ख़ुदा का हूँ !

ख़ुद की आग में जलके मैं मुनव्वर हूँ,
मैं कहाँ परवाना किसी शमा का हूँ !

मेरी रगों में भी बहता है गंगा का पानी
मैं मुसलमान हूँमगर हिन्दोस्तां का हूँ !!!

|||फ़राज़|||
मकां= House, Home.
चराग़= An Oil Lamp.
तलबगार= Seeker, Claimant, Desirous.
कहकशां= The Galaxy, The Milky Way.
शौक़= Fondness, Desire, Ardor
ख़्वाह-मख़ाह= Simply, For No Reason, Just Like That.
अज़ान= The Islamic Call To Prayer
पाबंद= Punctual.
मज़हब= Religion.
आलिम= Scholar, Learned, Intelligent.
अरबी= Arabic
ज़बां= Tongue, Speech.
ग़ुरूर= Proud.
ज़र्रा= An Atom, A Particle.
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened.
परवाना= Moth.

शमा= Candle.