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मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

अशआर !!!

दर्द खरीदने आया हूँ फ़िर दिल के बदले,
आज गाहक फ़िर मैं तेरी दुकान का हूँ !

मैंने ही जुर्म किया था मोहब्बत करके,
मुस्ताहिक़ तो बस मैं ही सज़ा का हूँ !

तेरी कहानी में मेरा ज़िक्र तो आना ही था,
मुख़्तसर ही सही, क़िस्सा तेरी दास्ताँ का हूँ !

तुझको चाहा बहुत मगर  पूज सका,
शायर हूँ, न की मुन्किर मैं ख़ुदा का हूँ !

भटक के बहुत दूर निकल आया हूँ,
मुसाफ़िर तो मैं तेरे ही कारवां का हूँ !

जलता देखा है क्या कभी अपने घर को,
मुझसे सुनो, मुसलमान मैं बर्मा का हूँ !

अबकी आये तो कभी छोड़कर न जाए,
मुन्तज़िर मैं ऐसे किसी महमाँ का हूँ !

प्यार के लालच में ही फँस जाता हूँ,
यूँ तो पक्का मैं भी ईमान का हूँ !

उनकी आँखें मुझे देख के जगमगाती हैं,
सितारा मैं माँ बाप की निगाह का हूँ !

पहले तुम मेरे अशआर तो पढ़कर देखो,
फ़िर बतलाओ इन्सान मैं किस तरह का हूँ !

|||फ़राज़|||

गाहक= Customer.
मुस्ताहिक़= Deserving
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
मुख़्तसर= Brief, Short.
क़िस्सा= Tale, Story
दास्ताँ= Story, Fable, Tale.
मुन्किर= Rejecting, Atheist, One who denies.
मुसाफ़िर= Traveller.
कारवां= Caravan. A company of travellers.
मुन्तज़िर= Expectant, One who waits.
महमाँ= Guest.
ईमान= Belief, conscience, Faith
अशआर= Couplets