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शनिवार, 8 जून 2019

एक दोस्त


पानी में पानी की तरह मिल गया,
एक दोस्त ज़िन्दगानी की तरह मिल गया !

लिखने बैठा मैं हिक़ायत-ए-हस्ती,
तेरा क़िस्सा कहानी की तरह मिल गया !

मैंने रब से रब का निशाँ माँगा,
तू रब की निशानी की तरह मिल गया !

मैं अब तलक एक ख़ामोश सा दरिया था,
तू मौजों की रवानी की तरह मिल गया !

इस नए ज़माने की अफ़रा-तफ़री में,
तू एक उम्र पुरानी की तरह मिल गया !

मायूस था 'अल्फ़ाज़के दिल का बच्चा,
तू बचपन की शैतानी की तरह मिल गया !

||| अल्फ़ाज़ |||

ज़िन्दगानी = Life, जीवन
हिक़ायत-ए-हस्ती= Story Of The Existence, जीवनी
क़िस्सा = Tale
निशाँ = Mark, Sigh, चिन्ह
अफ़रा-तफ़री = Mayhem
दरिया = River, नदी
मौज = Wave, लहर
रवानी = Fluency, Flow, प्रवाहबहाव
मायूस = Disappointed, Without Hope, निराशहताश


रविवार, 25 नवंबर 2018

इतवार

ऐ इतवार, कभी फ़ुर्सत से मिल,
तुझे गुज़ारेंगे बचपन की तरह !

||| अल्फ़ाज़ |||


फ़ुर्सत = Leisure, Freedom, Rest

सोमवार, 27 अगस्त 2018

सावन

छू जाओ मेरे ज़ख्मों को मरहम की तरह,
बरस जाओ मुझपर घने सावन की तरह !

तेरे ख़याल में इतवार की सी फ़ुर्सत है,
तू पहली बारिश, तू घर के आंगन की तरह !

ये और बात है कि निगाह से दूर रहते हो,
दिल में सदा रहते हो धड़कन की तरह !

दुनिया से बे-फ़िक्र हो जाऊं मैं फ़िर से,
लौट आओ कभी मेरे बचपन की तरह !

रूह प्यासी है किसी सूखे हुए पत्ते की तरह,
कभी मुझपे ठहर जाओ शबनम की तरह !

छू जाओ मेरे ज़ख्मों को मरहम की तरह,
बरस जाओ मुझपर घने सावन की तरह !

||| फ़राज़ |||
















दोस्तों, इस बार आप लोगों की कोई भी एंट्री सेलेक्ट नहीं की जा रही है ! मुझे उम्मीद है की अगली बार आप लोग बेहतर एंट्रीज़ ले कर आयेंगे ! इस बार अल्फ़ाज़ की एक कोशिश पेश की जा रही है !

क्यूँ न खुद से ही मोहब्बत कर के देखें

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

मैं !!!

तुझको अक्सर मैं छू के गुजरूँगा,
झौंका मैं इसी शहर की हवा का हूँ !

मेरा बचपन तेरे आँगन में भी तो खेला है,
बच्चा तो मैं पड़ोस के ही मकां का हूँ !

मुझको बहला न पाओगे तुम चराग़ों से,
मैं तलबगार तो सिर्फ़ कहकशां का हूँ !

अरे ओ मेरी रौशनी से जलने वालों,
अभी सितारा तो बस मैं सुबह का हूँ !

जानवर खाने का शौक़ मैं भी रखता हूँ,
मुसलमान मैं भी कहाँ ख़्वाह-मख़ाह का हूँ !

अज़ान के वक़्त तुम भी ज़रा ख़ामोश रहो,
यूँ तो पाबंद मैं भी गुनाह का हूँ !

मुझको हिंदी में मज़हब तुम सिखलाओ,
मैं आलिम कहाँ अरबी ज़बां का हूँ !

क्यूँ न हो ग़ुरूर मुझे अपनी हस्ती पर,
ज़र्रा तो मैं भी उसी ख़ुदा का हूँ !

ख़ुद की आग में जलके मैं मुनव्वर हूँ,
मैं कहाँ परवाना किसी शमा का हूँ !

मेरी रगों में भी बहता है गंगा का पानी
मैं मुसलमान हूँमगर हिन्दोस्तां का हूँ !!!

|||फ़राज़|||
मकां= House, Home.
चराग़= An Oil Lamp.
तलबगार= Seeker, Claimant, Desirous.
कहकशां= The Galaxy, The Milky Way.
शौक़= Fondness, Desire, Ardor
ख़्वाह-मख़ाह= Simply, For No Reason, Just Like That.
अज़ान= The Islamic Call To Prayer
पाबंद= Punctual.
मज़हब= Religion.
आलिम= Scholar, Learned, Intelligent.
अरबी= Arabic
ज़बां= Tongue, Speech.
ग़ुरूर= Proud.
ज़र्रा= An Atom, A Particle.
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened.
परवाना= Moth.

शमा= Candle.