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शनिवार, 8 जून 2019

एक दोस्त


पानी में पानी की तरह मिल गया,
एक दोस्त ज़िन्दगानी की तरह मिल गया !

लिखने बैठा मैं हिक़ायत-ए-हस्ती,
तेरा क़िस्सा कहानी की तरह मिल गया !

मैंने रब से रब का निशाँ माँगा,
तू रब की निशानी की तरह मिल गया !

मैं अब तलक एक ख़ामोश सा दरिया था,
तू मौजों की रवानी की तरह मिल गया !

इस नए ज़माने की अफ़रा-तफ़री में,
तू एक उम्र पुरानी की तरह मिल गया !

मायूस था 'अल्फ़ाज़के दिल का बच्चा,
तू बचपन की शैतानी की तरह मिल गया !

||| अल्फ़ाज़ |||

ज़िन्दगानी = Life, जीवन
हिक़ायत-ए-हस्ती= Story Of The Existence, जीवनी
क़िस्सा = Tale
निशाँ = Mark, Sigh, चिन्ह
अफ़रा-तफ़री = Mayhem
दरिया = River, नदी
मौज = Wave, लहर
रवानी = Fluency, Flow, प्रवाहबहाव
मायूस = Disappointed, Without Hope, निराशहताश


मंगलवार, 10 जुलाई 2018

दाग़ !!!

दम है तो छीन ले तू ज़माने से,
हक़ नहीं मिलता है जताने से !

ख़ुद का सामना वो कैसे करेंगे,
वो जो डर गए हैं ज़माने से !

वो वादा-फ़रामोश है मुनाफ़े में,
हम ख़सारे में हैं निभाने से !

ये क्या कि तूने बेवफ़ाई कर दी,
चला जाता किसी और बहाने से !

तुझे भूलने की कोशिश मैं नहीं करता,
ये आग और जलती है बुझाने से !

उम्मीद इस क़दर ख़त्म हुई जैसे,
कोई मिट्टी लग गई हो ठिकाने से !

मुझे दाग़ समझ या निशान मगर,
'फ़राज़मिटेगा नहीं तेरे मिटाने से !

||| फ़राज़ |||

हक़= Right
ज़माना= Time, World, Era
वादा-फ़रामोश= Promise Forgetter/Breaker
मुनाफ़ा= Profit
ख़सारा= Loss
बेवफ़ाई= Faithlessness, Treachery
उम्मीद= Hope
क़दर= Amount 
मिट्टी= Burial, Mud
दाग़= Spot, Blame, Scar, Freckle
निशान= Mark, Impression

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

दस्तक

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...

पर कुछ निशानियाँ बच गयी होंगी
बंद अलमारी के किसी कोने में,
अपने कुछ पुराने कपड़ों के बीच
जो तुमने छुपा के रखी थीं !

पर शायद अब वो फूल न होगा,
जो तुमने अपनी एक डायरी में,
मुलाक़ात के साथ रख छोड़ा था,
तेरी लिखावट में मेरे निशान बाकी होंगे !

कुछ लम्हें आज भी सिमटे मिल जाएँगे
गुज़रे कल की धुंधली तस्वीरों में,
पर कुछ लम्हों को तो तुमने
महज़ यादों में ही खंगाला होगा !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...
थक के लौट आती है तेरे दर से
अक्सर मेरी मायूस दस्तक !

कुछ लोग बारहा वहां अब भी रहते हैं,
पर अब वहां वो नहीं रहता,
जो मेरी हलकी सी आहट सुनकर,
          घरवालों से हज़ार बहाने करके,
दौड़ के आ जाता था खिड़की पर,
कभी छ्त, तो कभी दरवाज़े पर!


मेरे ख़याल मुझे ही छल कर,
अक्सर उस गली में ले जाते हैं,
दस्तक उस दर पर देते हैं,
पर कोई जवाब नहीं आता !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

निशानियाँ



ये न सोचा था की फ़ासला इतना होगा,
तेरी तस्वीर होगी पर तेरा चेहरा न होगा !

दूरियों की धुंध छाती थी, छंट जाती थी,
अबकी जो धुंध छंटी तो भी सवेरा न होगा !

मैं न सही पर कुछ निशानियाँ तो बाक़ी होंगी,
एक सूखा गुलाब किताबों में अब भी रखा होगा !

यूँ तो बहुत कुछ है जो अभी अनकहा ही रह गया,
अनकहा ही रहेगा जो फ़िर न कभी सामना होगा,

तुमसे ही शुरू हुए और तुम पर ही ख़त्म,
इससे बेहतर न मेरी कहानी का तर्जुमा होगा !!!

|||फ़राज़|||