मैं
जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे
पड़ोस के उस घर में...
पर कुछ
निशानियाँ बच गयी होंगी
बंद
अलमारी के किसी कोने में,
अपने कुछ
पुराने कपड़ों के बीच
जो तुमने
छुपा के रखी थीं !
पर शायद
अब वो फूल न होगा,
जो तुमने
अपनी एक डायरी में,
मुलाक़ात
के साथ रख छोड़ा था,
तेरी
लिखावट में मेरे निशान बाकी होंगे !
कुछ
लम्हें आज भी सिमटे मिल जाएँगे
गुज़रे कल
की धुंधली तस्वीरों में,
पर कुछ
लम्हों को तो तुमने
महज़
यादों में ही खंगाला होगा !
मैं
जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे
पड़ोस के उस घर में...
थक के
लौट आती है तेरे दर से
अक्सर
मेरी मायूस दस्तक !
कुछ लोग
बारहा वहां अब भी रहते हैं,
पर अब
वहां वो नहीं रहता,
जो मेरी
हलकी सी आहट सुनकर,
घरवालों से हज़ार बहाने करके,
घरवालों से हज़ार बहाने करके,
दौड़ के आ
जाता था खिड़की पर,
कभी छ्त, तो कभी
दरवाज़े पर!
मेरे
ख़याल मुझे ही छल कर,
अक्सर उस
गली में ले जाते हैं,
दस्तक उस
दर पर देते हैं,
पर कोई
जवाब नहीं आता !
मैं
जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे
पड़ोस के उस घर में...