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मंगलवार, 23 मई 2017

ज़िन्दगी !!!

कभी भागती
कभी थमी-थमी सी लगती है !
ज़िन्दगी आजकल
अजनबी सी लगती है !

दिल ने आज
तेरी उम्मीद छोड़ दी शायद !
सांस भी ज़रा
थमी-थमी सी लगती है !

तेरे ख़याल आज
धुंधले- धुंधले से लगते हैं !
तेरी तस्वीर आज
लाज़मी सी लगती है !

वक़्त शायद
बहुत तेज़ गुज़रा होगा !
घड़ियाँ दीवार पर
थकी-थकी सी लगती है !

तूने जाते हुए
आज न मुड़कर देखा !
ये मुलाक़ात शायद
आख़िरी सी लगती है !

देर कर दी
तूने आने में फ़राज़’,
अपनी सी वो निगाह
अब अजनबी सी लगती है !

||| फ़राज़ |||


लाज़मी = compulsory, essential

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

दस्तक

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...

पर कुछ निशानियाँ बच गयी होंगी
बंद अलमारी के किसी कोने में,
अपने कुछ पुराने कपड़ों के बीच
जो तुमने छुपा के रखी थीं !

पर शायद अब वो फूल न होगा,
जो तुमने अपनी एक डायरी में,
मुलाक़ात के साथ रख छोड़ा था,
तेरी लिखावट में मेरे निशान बाकी होंगे !

कुछ लम्हें आज भी सिमटे मिल जाएँगे
गुज़रे कल की धुंधली तस्वीरों में,
पर कुछ लम्हों को तो तुमने
महज़ यादों में ही खंगाला होगा !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...
थक के लौट आती है तेरे दर से
अक्सर मेरी मायूस दस्तक !

कुछ लोग बारहा वहां अब भी रहते हैं,
पर अब वहां वो नहीं रहता,
जो मेरी हलकी सी आहट सुनकर,
          घरवालों से हज़ार बहाने करके,
दौड़ के आ जाता था खिड़की पर,
कभी छ्त, तो कभी दरवाज़े पर!


मेरे ख़याल मुझे ही छल कर,
अक्सर उस गली में ले जाते हैं,
दस्तक उस दर पर देते हैं,
पर कोई जवाब नहीं आता !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...