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सोमवार, 17 जून 2019

फ़ासले

इस तरह थे कभी फ़ासले ही नहीं,
यूँ मिले जैसे पहले मिले ही नहीं !

उनसे पहले कोई दर्द हमको न था,
उनसे पहले कोई ग़म मिले ही नहीं !

आ भी जाओ तो वो बात होगी नहीं,
तुममें हममें वो अब सिलसिले ही नहीं !

सारे इल्ज़ाम तस्लीम हमने किये,
दरमियाँ अब कोई मसअले ही नहीं !

आख़िरी बार हमसे वो ऐसे मिले,
जैसे पहले कभी भी मिले ही नहीं !

उनको ख़ुश देख कर हम ज़रा जल गए,
हमको लगता था हम दिल-जले ही नहीं !

उम्र भर की कचहरी का चक्कर है इश्क़,
रोज़ तारीख़ हैफ़ैसले ही नहीं !

उनसे अल्फ़ाज़’ जब इश्क़ ही न रहा,
उनसे शिकवे नहींऔर गिले ही नहीं !

||| अल्फ़ाज़ |||

फ़ासले = Distance, दूरी
इल्ज़ाम = Allegation, Blame, आरोप
तस्लीम = Accept, Acknowledge, स्वीकार
दरमियाँ = Middle, In Between, मध्य
मसअले = Problem , Matter, 
दिल-जले = Bereaved, Frustrated
कचहरी = Court, न्यायालय
तारीख़ = Date, 
फ़ैसले = Decision, Judgment, निर्णय
शिकवे = Complaint, Reproach 
गिले = Complaint, Lamentation

मंगलवार, 23 मई 2017

ज़िन्दगी !!!

कभी भागती
कभी थमी-थमी सी लगती है !
ज़िन्दगी आजकल
अजनबी सी लगती है !

दिल ने आज
तेरी उम्मीद छोड़ दी शायद !
सांस भी ज़रा
थमी-थमी सी लगती है !

तेरे ख़याल आज
धुंधले- धुंधले से लगते हैं !
तेरी तस्वीर आज
लाज़मी सी लगती है !

वक़्त शायद
बहुत तेज़ गुज़रा होगा !
घड़ियाँ दीवार पर
थकी-थकी सी लगती है !

तूने जाते हुए
आज न मुड़कर देखा !
ये मुलाक़ात शायद
आख़िरी सी लगती है !

देर कर दी
तूने आने में फ़राज़’,
अपनी सी वो निगाह
अब अजनबी सी लगती है !

||| फ़राज़ |||


लाज़मी = compulsory, essential