kachahri लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
kachahri लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 17 जून 2019

फ़ासले

इस तरह थे कभी फ़ासले ही नहीं,
यूँ मिले जैसे पहले मिले ही नहीं !

उनसे पहले कोई दर्द हमको न था,
उनसे पहले कोई ग़म मिले ही नहीं !

आ भी जाओ तो वो बात होगी नहीं,
तुममें हममें वो अब सिलसिले ही नहीं !

सारे इल्ज़ाम तस्लीम हमने किये,
दरमियाँ अब कोई मसअले ही नहीं !

आख़िरी बार हमसे वो ऐसे मिले,
जैसे पहले कभी भी मिले ही नहीं !

उनको ख़ुश देख कर हम ज़रा जल गए,
हमको लगता था हम दिल-जले ही नहीं !

उम्र भर की कचहरी का चक्कर है इश्क़,
रोज़ तारीख़ हैफ़ैसले ही नहीं !

उनसे अल्फ़ाज़’ जब इश्क़ ही न रहा,
उनसे शिकवे नहींऔर गिले ही नहीं !

||| अल्फ़ाज़ |||

फ़ासले = Distance, दूरी
इल्ज़ाम = Allegation, Blame, आरोप
तस्लीम = Accept, Acknowledge, स्वीकार
दरमियाँ = Middle, In Between, मध्य
मसअले = Problem , Matter, 
दिल-जले = Bereaved, Frustrated
कचहरी = Court, न्यायालय
तारीख़ = Date, 
फ़ैसले = Decision, Judgment, निर्णय
शिकवे = Complaint, Reproach 
गिले = Complaint, Lamentation