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गुरुवार, 17 नवंबर 2016

दहलीज़

एक सिहरन सी मेरी रगों में दौड़ती है,
सांस तेरी मुझे छू के गई हो जैसे !
बेसाख़्ता ही मुस्कुरा दिया एक ख़याल से मैं,
तेरी बातों में आज भी कोई गुदगुदी हो जैसे !

तेरी गर्दिश मेरे ज़हन में यूँ रहती है,
मेरी धड़कन से बाक़ी तेरी दोस्ती हो जैसे !
तेरे वजूद को ढूंढती हैं अक्सर बाहें,
मुझमें बाक़ी सी तेरी तिश्नगी हो जैसे !

हर अपने की अपनाईयत से वाकिफ़ हूँ,
धुंध आँखों से मेरी छंट गयी हो जैसे !
कल मैं गुज़रा था फ़िर तेरी गलियों से,
वो दीवार-ओ-दर अब अजनबी हों जैसे !

मेरे नाम से अब भी तू चौंक सा जाता है,
फांस कोई सीने में चुभी रह गयी हो जैसे !
तेरे अहसास ने फिर टटोला यूँ मेरे दिल को,
मेरी दहलीज़ पर आज भी तू खड़ी हो जैसे !

|||फ़राज़|||

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

निशानियाँ



ये न सोचा था की फ़ासला इतना होगा,
तेरी तस्वीर होगी पर तेरा चेहरा न होगा !

दूरियों की धुंध छाती थी, छंट जाती थी,
अबकी जो धुंध छंटी तो भी सवेरा न होगा !

मैं न सही पर कुछ निशानियाँ तो बाक़ी होंगी,
एक सूखा गुलाब किताबों में अब भी रखा होगा !

यूँ तो बहुत कुछ है जो अभी अनकहा ही रह गया,
अनकहा ही रहेगा जो फ़िर न कभी सामना होगा,

तुमसे ही शुरू हुए और तुम पर ही ख़त्म,
इससे बेहतर न मेरी कहानी का तर्जुमा होगा !!!

|||फ़राज़|||