नींद में तकिये तले ये बुलाता कौन
है,
बोझिल मेरी आँखों को ये सुलाता कौन
है !
तूने ही शायद अन्दर से दस्तक दिल पे
दी होगी,
मेरी दहलीज़ पे आकर मुझको अब बुलाता
कौन है !
तू काफ़िर तो न था फ़िर ये तेरे
हमशक्ल जैसा,
मयक़दे के दर तलक मुझको ले जाता कौन
है !
चलो आज कुछ इल्ज़ाम हम ही कुबूल कर
लें,
यूँ भी दिल-ए-नादाँ को अब मनाता
कौन है !
दिल-ए-पशेमान भी अब तो ये जानता है,
लड़कपन के वादे आख़िर निभाता कौन है
!
मेरे काँधे पे बिखरी तेरी ज़ुल्फ़ तो
कब की फिसल गई,
मेरे मन के उलझे धागों को अब
सुलझाता कौन है !
एक ख़ामोश मोहब्बत और कुछ बदनाम
फ़साने,
मुद्दतों तलक कुछ अख़बार भला जलाता
कौन है !
तू तसव्वुर है उसका तो चल तू ही
बता,
हक़ीकत से मेरी अब मुझको डराता कौन
है !
चल सो जाएं ‘फ़राज़’ कि मन आज रूठा
सा है,
देखते हैं ख़्वाब में आज मनाने आता
कौन है !
||| फ़राज़ |||
||| फ़राज़ |||