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मंगलवार, 20 नवंबर 2018

रज़ा

सोचता हूँ कितना मज़ा हो जाए,
मेरी मर्ज़ी पे जो रब की रज़ा हो जाए !

मैं बेवफ़ाई करूँ और तू तड़पे,
मेरे गुनाह की तुझको सज़ा हो जाए !

मेरा ज़िक्र आये और तू पशेमाँ हो,
हक़ मेरी वफ़ाओं का अदा हो जाए !

तू भी तड़पे तो हमको क़रार आए,
तेरे अश्क़ों से मेरे ग़म की दवा हो जाए !

तेरी आँखों से भी रूठ जाएँ तेरी नींदें,
रात-दर-रात ये हादिसा हो जाए !

किसी और का गिला तू कभी मुझसे करे, 
तेरा नुक़सान हो तो मेरा नफ़ा हो जाए !

तेरी अना भी टूट कर बिखरे,
तू भी मेरी तरह बेवजह हो जाए !

तुझको तेरे किरदार से नफ़रत होगी,
'अल्फ़ाज़' भी अगर तेरी तरह हो जाए !


||| अल्फ़ाज़ |||

रज़ा = Permission, Consent, Will,
ज़िक्र = Remembrance, Talk
पशेमाँ = Repentant, Embarrassed
हक़ = Right, Claim, Due, 
क़रार = Peace, Tranquility
ग़म = Sorrow, Grief
रात-दर-रात = Every-Night
हादिसा = Accident, Calamity, Misfortune
गिला = Complaint
नफ़ा = Profit
अना = Ego
बेवजह = Causeless, Useless
किरदार = Character

शनिवार, 26 मई 2018

तो हमको चैन पड़े !!!

वो फ़िर बुलाएँ तो हमको चैन पड़े,
पर हम न जाएँ तो हमको चैन पड़े !

यूँ तो रूठ कर सुकून ज़्यादा है,
पर वो मनाएँ तो हमको चैन पड़े !

उनके चेहरे पे नदामत हो और,
हम मुस्कुराएँ तो हमको चैन पड़े !

मेरे सवालों पे पशेमां हो के,
वो आँसू बहाएं तो हमें चैन पड़े !

वो रोएँ हमसे लिपट कर के और,
हमको भी रुलाएँ तो हमको चैन पड़े !

ज़माना बेवफ़ा कहता है उनको,
वो ख़ुद बताएँ तो हमको चैन पड़े !

उनकी वफ़ा को भी बेवफ़ाई से,
कोई आज़माये तो हमको चैन पड़े !

उनसे भी कोई वादे करके,
न निभाये तो हमें चैन पड़े !

जिसे वो चाहते हैं वही उनका,
दिल दुखाए तो हमको चैन पड़े !

काश यूँ हो कि कोई उनको भी,
छोड़ जाए तो हमको चैन पड़े !

हमसे नहीं तो हमारी ग़ज़ल से ही,
वो दिल लगाएँ तो हमको चैन पड़े !

उनकी ही तरह हम भी उनको,
भूल जाएँ तो हमको चैन पड़े !

शायद तमन्ना अब भी यही दिल में है,
कि वो लौट आएँ तो हमको चैन पड़े !

'फ़राज़' ये जीतने वाले हमसे,
हार जाएँ तो हमको चैन पड़े !

||| फ़राज़ |||


चैन= Comfort, Ease, Happiness, Peace
सुकून= Peace, Rest, Tranquility
नदामत= Regret, Repentance, Shame
पशेमां= Embarrassed/ Penitent
बेवफ़ा= Faithless, Treacherous
वफ़ा= Fidelity, Faithful
शायद= Perhaps
तमन्ना= Wish, Desire, Inclination, Request

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

एक अरमां !

मौसम-ए-सर्द आया है फ़ज़ा-ए-दिल में,
दिल के कोने में फ़िर ठिठुरता है एक अरमां !

बर्फ़ की झील के जैसे ठहरे मेरे मन में,
राख़ में शोले सा सुलगता है एक अरमां !

जाने किस दर्द में मुब्तला दिल इतना है,
कि दम-ब-दम आह भरता है एक अरमां !

रूह भी छोड़ ही जाती है एक रोज़ जिस्म को,
दिल-ए-बर्बाद से कब निकलता है एक अरमां !

कभी लबों पे भी आ जाता है हंसी बन कर,
कभी आँखों से भी छलकता है एक अरमां !

ये बस अरमां है, कोई हक़ीकत तो नहीं,
क्यूँ पशेमां है जो बिखरता है एक अरमां !

किसकी उम्मीद में चराग़ाँ करता है तू,
किसकी हुज़ूर में संवारता है एक अरमां !

एक पतंगे की मौत रोज़ मरता है 'फ़राज़'
एक शम्मा पे रोज़ मचलता है एक अरमां !

|||फ़राज़|||

मौसम-ए-सर्द= Season of winters.
फ़ज़ा-ए-दिल= Open and extensive area of the heart.
अरमां= Desire, Longing.
मुब्तला= Afflicted, Distressed.
दम-ब-दम= Every moment, Continuously.
आह= Sigh, Moan.
दिल-ए-बर्बाद= Ruined heart.
लब= Lips.
हक़ीक़त= Reality, Condition, State.
पशेमां= Embarrassed, Penitent.
चराग़ाँ= Illumination, Display of lamps.
हुज़ूर= Presence of a superior authority.
पतंगा= Moth.
रोज़= Every day.
शम्मा= Candle.


शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

तसव्वुर !!!

नींद में तकिये तले ये बुलाता कौन है,
बोझिल मेरी आँखों को ये सुलाता कौन है !

तूने ही शायद अन्दर से दस्तक दिल पे दी होगी,
मेरी दहलीज़ पे आकर मुझको अब बुलाता कौन है !

तू काफ़िर तो न था फ़िर ये तेरे हमशक्ल जैसा,
मयक़दे के दर तलक मुझको ले जाता कौन है !

चलो आज कुछ इल्ज़ाम हम ही कुबूल कर लें,
यूँ भी दिल-ए-नादाँ को अब मनाता कौन है !

दिल-ए-पशेमान भी अब तो ये जानता है,
लड़कपन के वादे आख़िर निभाता कौन है !

मेरे काँधे पे बिखरी तेरी ज़ुल्फ़ तो कब की फिसल गई,
मेरे मन के उलझे धागों को अब सुलझाता कौन है !

एक ख़ामोश मोहब्बत और कुछ बदनाम फ़साने,
मुद्दतों तलक कुछ अख़बार भला जलाता कौन है !

तू तसव्वुर है उसका तो चल तू ही बता,
हक़ीकत से मेरी अब मुझको डराता कौन है !

चल सो जाएं ‘फ़राज़’ कि मन आज रूठा सा है,
देखते हैं ख़्वाब में आज मनाने आता कौन है !

||| फ़राज़ |||