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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

एक अरमां !

मौसम-ए-सर्द आया है फ़ज़ा-ए-दिल में,
दिल के कोने में फ़िर ठिठुरता है एक अरमां !

बर्फ़ की झील के जैसे ठहरे मेरे मन में,
राख़ में शोले सा सुलगता है एक अरमां !

जाने किस दर्द में मुब्तला दिल इतना है,
कि दम-ब-दम आह भरता है एक अरमां !

रूह भी छोड़ ही जाती है एक रोज़ जिस्म को,
दिल-ए-बर्बाद से कब निकलता है एक अरमां !

कभी लबों पे भी आ जाता है हंसी बन कर,
कभी आँखों से भी छलकता है एक अरमां !

ये बस अरमां है, कोई हक़ीकत तो नहीं,
क्यूँ पशेमां है जो बिखरता है एक अरमां !

किसकी उम्मीद में चराग़ाँ करता है तू,
किसकी हुज़ूर में संवारता है एक अरमां !

एक पतंगे की मौत रोज़ मरता है 'फ़राज़'
एक शम्मा पे रोज़ मचलता है एक अरमां !

|||फ़राज़|||

मौसम-ए-सर्द= Season of winters.
फ़ज़ा-ए-दिल= Open and extensive area of the heart.
अरमां= Desire, Longing.
मुब्तला= Afflicted, Distressed.
दम-ब-दम= Every moment, Continuously.
आह= Sigh, Moan.
दिल-ए-बर्बाद= Ruined heart.
लब= Lips.
हक़ीक़त= Reality, Condition, State.
पशेमां= Embarrassed, Penitent.
चराग़ाँ= Illumination, Display of lamps.
हुज़ूर= Presence of a superior authority.
पतंगा= Moth.
रोज़= Every day.
शम्मा= Candle.