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बुधवार, 28 जून 2017

हिज्र के मौसम !!!

अपनी ही अना की किरचियों से
हम लेकर पोशीदा ज़ख्म लौटे,
आज तेरी चौखट से पशेमान
फ़िर हम मायूस क़दम लौटे!

मेरे किसी अपने के पते पर
अब कोई अग़यार रहता है,
तजुर्बों से संगसार होकर
न जाने कितने वहम लौटे!

तू दरवाज़े तक आकर भी
कुछ सोच कर लौट गया,
हसरतज़दा निगाहों में 
बारहा आख़िर सावन लौटे!

दहलीज़ पर तेरी न ढूँढ सके
क़दमों का तेरा हम कोई निशान,
उम्मीद की बिसरी गलियों में 
आज फ़िर हिज्र के मौसम लौटे!

|||फ़राज़||||

अना= self, ego

पोशीदा= hidden
पशेमान= embarrassed, penitent
अग़यार= strangers, opponents
संगसार= stoned, stoned to death
हसरतज़दा= overwhelmed, grief-stricken
बिसरी= forgotten
हिज्र= separation